Tuesday, July 23, 2019

मजबूत लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना जरूरी


कहते है जब तराजू  के दोनों पलड़े समान होते है तभी वस्तु का भार और मोल सही लगता है। यही बात हर परिस्थिति में उपयुक्त होती है फिर चाहे बात सत्ता की ही क्यों न हो?
वहां भी तराजू के दोनों पलड़े अर्थात पक्ष और विपक्ष का सही अनुपात में होना व विशेष रूप से विपक्ष का मजबूत होना एक सही लोकतंत्र की न सिर्फ मांग होती है यही उसका आधार भी है| जो सरकार की कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलाने में मददगार सिद्ध होता है| 11 मई से 19 मई तक 17 वी लोकसभा के लिए हुए चुनाव के बाद जो परिणाम 23 मई को आये जिसके तहत एनडीए ने बहुमत के साथ जीत दर्ज की तथा काँग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा।उसके बाद से काँग्रेस की जो भी हालत देखने को मिल रही है उससे लोकतंत्र का सुचारू रूप से चलना खतरे की निशानी को दर्शा रहा है | जिस प्रकार से किसी भी प्रतिस्पर्धा में हार-जीत का होना उतना ही तय होता है, जितना कि सुबह-शाम का होना । उसी प्रकार से चुनाव में भी हर जीत होती है परन्तुं महत्वपूर्ण होता है हार के बाद भी लोकतंत्र में खुद के अस्तित्व को बनाये रखना व उसके लिए सदैव कार्य करते रहना। परन्तु जिस तरह की आशंकाए,घटनाएं एक राष्ट्रीय पार्टी (कांग्रेस) में हो रही है उसको देख कर तो यही लगता है कि या तो वह अपनी हार स्वीकार ही नही कर पा रही है या अपने दायित्वों से दूर भाग रही है जहां काँग्रेस को एक मजबूत विपक्ष के रूप में सरकार की नीतियों ,कार्यशैलियों तथा कार्यप्रणालियों पर अपनी पैनी नज़र रखते हुए उनका समर्थन व विरोध करना चाहिए । वह यह न करते हुए ,अपने ही पार्टी के भीतर चल रहे द्वंद से गुजर रही है इस वक़्त जहां काँग्रेस ,अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी को एक महत्वपूर्ण भूमिका के साथ विपक्ष को मजबूत बनना चाहिए वे स्वयं को पार्टी से अलग कर रहे है या यूं कहूँ उन्होंने अलग कर दिया है पर क्या ये सही वक्त है इस तरह की गतिविधियों का। उनके इस्तीफे के बाद जिस तरह से कांग्रेस के कई मंत्रियों, विधायकों द्वारा इस्तीफे दिए जा रहे है और जिस तरह से कर्नाटक और गोवा में पार्टी की स्थिति बिगड़ रही है यह काँग्रेस के लिए चिंता का विषय होना चाहिए । इससे तो यही लगता है कि काँग्रेस विपक्ष की भूमिका निभाना नही चाहती ।वह सिर्फ स्वयं को सत्ता में पक्ष या सरकार के रूप में देखना उचित समझती है । यदि ऐसा नही तो ये इस्तीफों का दौर क्यों? 28 दिसंबर 1885 को स्थापित पार्टी का 134 साल बाद इतनी कमजोर व संकट की अवस्था मे  होना  अत्यंत चिंताजनक स्थिति को उजागर करता है। जहाँ पार्टी को आत्ममंथन व हार के कारणों के बारे में सोचना चाहिए ,वहां इस तरह की प्रतिक्रियाएं न सिर्फ चौकाने वाली अपितु एक कमजोर पार्टी को दर्शाती है जो भारत के लोकतंत्र के लिए सही नही है । क्योंकि ऐसी स्थिति में केवल एक ही पार्टी का स्वायत्त अत्यंत खतरनाक सिद्ध हो सकता है यह समय है मजबूत विपक्ष के रूप में मजबूती के साथ सत्ता के कार्यो को देखने व समझने का। अतः काँग्रेस पार्टी को अब राहुल गांधी को मनाने में समय व्यर्थ न करते हुए ,अपना न सिर्फ अध्यक्ष चुनना चाहिए बल्कि आने वाले अन्य विधानसभ चुनाव जैसे महाराष्ट्र, पंजाब,हरियाणा, दिल्ली,उत्तरप्रदेश आदि को जीतने की रणनीतियों पर भी अब ध्यान देना जरूरी है । क्योंकि अब वक्त स्वयं को पुनः स्थापित करने का है न कि हर दायित्व से दूर भागने का। आशा है काँग्रेस जल्द ही अपना अध्यक्ष चुनकर पार्टी के कार्यों को सुचारु रूप से शुरू कर देगी तथा पार्टी के अंदर चल रहे द्वंद भी समाप्त हो जायेंगे।
लेखिका
प्रियंका खरे"श्री"
12/7/2019

Sunday, July 14, 2019

वो कौन थी

वो कौन थी
आज वो कौन है
सिकन है ये कैसी
माथे पे उसके,
अनजान हो गये
चेहरे की, वो खुशी ,
वो कौन थी
आज वो कौन है।
लिपटी है खुदमे
या खुल सी गयी है
मासूम सी मायूस सी
कली
वो कौन थी
आज वो कौन है।
लफ्जों में बंधी है
पढ़ी गयी है अर्थों में
अनसुलझी सी
एक अनजान पहेली
वो कौन थी
आज वो कौन है।
ख़्वाओं में देखा था जिसे
ख्वाहिस थी जिसकी
अधूरे ख्वाब से रह गयी
वो कौन थी
आज वो कौन है
आँसुयों की सच्चाई है
या बंद लबों के शब्द
जानता था मैं जिसे
वो कौन थी
आज वो कौन है
लड़कपन सा था जिसमे
सयानी फिर भी दिखती थी
रहती थी जो अपने धुन में
वो कौन थी
आज वो कौन है
समझा जिसे न तब कोई था
न अब कोई समझ सका
मीलो चलते रास्ते सी
अजनबी,
वो कौन थी
आज वो कौन है
   प्रियंका श्री
  14/7/19

Monday, July 1, 2019

सत्ता में महिलाएं भी सुरक्षित नही

बात जब महिलायों की आती है तो उन महिलायों पर अकसर चर्चा होती है जो कमजोर है खुद के निर्णय नही ले सकती ,ज्यादा पढ़ी लिखी नही है, स्वतंत्र नही है न ही सोच से और न ही सामाजिक बंधनो से, जो हमेशा पुरुष प्रधान देश में सिर्फ एक ऐसा पुतला बनकर रहती है जो पुरुष के कहे अनुसार ही चलती है। ऐसा वर्ग औरतों का दयनीय ,कमजोर वर्ग कहलाता है वही दूसरी तरफ पढ़ी लिखी, आपमे निर्णय लेने वाली, आत्मविश्वास से भरी, खुद के पैरों पर खड़ी महिलायों का वर्ग है। जिसे मॉर्डन भी कहा जाता है पर अगर दोनों की स्थिति को नापा जाए तो ज्यादा अंतर नही मिलने वाला । और जो अंतर है भी वो ये है कि पढ़ी लिखी महिला जागरूक होती है इसलिए गलत पर आवाज़ उठती है जिसकी वजह से उसे हर बार न जाने कितनी गलियों से , निगाहों से, शब्दों से अपमानित भी होना पड़ता है। बस वह दबती नही तो उसकी चर्चा हो जाती है सब तक एक खबर की तरह पहुच जाती है ऐसा ही अब देखने को मिलता है राजनीति के क्षेत्र में ,पहले भी जहाँ महिलाएं रही है और बड़े बड़े औदों पर फिर भी कभी उनके चरित्र व उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग नही किया गया परन्तु आज कल के नेतायों को न जाने क्यों लगता है कि
महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करके वे उन्हें कमजोर और असहाय महसूस करा सकते है व उन्हें उनके कर्म से दूर करा सकते है?

एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के नेताओं द्वारा एक प्रसिद्व अभिनेत्री व सांसद रही महिला पर की गई टिप्पणी इतनी शर्मनाक थी कि टीवी चैनेल भी उसे mute करके दिखा रहे है क्या यही आज की राजनीति है जो सिर्फ अब अभद्र भाषा ,चरित्र पर धावा बोलकर खुद को निश्छल और साफ बनाना बताती है अगर आपके पास उनके द्वारा किये गए जन कार्यों पर कोई प्रश्न नही है तो ऐसी भाषायों का उपयोग आपके चरित्र व सम्मान को शोभनीय नही लगता ।आप जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि है जब आप ही शालीन और शोभनीय भाषा का उपयोग नही करेंगे तो आम जनता से क्या आशा करते है।
कहते है न जैसा राजा वैसी प्रजा....

अतः महिलाओं से विनती है कि अब उन्हें खुद के लिए कदम उठाने ही होंगे व ऐसी टिप्पणियों के जबाब भी देने होंगे।महिलाएं कही सुरक्षित नही है और यही आज की सच्चाई है  ।
प्रियंका श्री
1/7/19

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...