Tuesday, November 9, 2021

मुसाफ़िर

मुसाफ़िरों के शहर में 
   हमसफ़र ढूढ़ने चला था
वो मेरा ही आईना था
    जो मेरे अक्स से 
रूठ के खड़ा था
     जज़्बाती होकर
लिए थे कुछ फैसले
     बिना तालिम
दिल आगे बढ़ चला था
मीरांत
10/11/21

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...