Tuesday, February 27, 2018

विचार

जब मन में भावों की
उथल पुथल मच जाये।
न बसे तब चैन मन में
बुद्धि भी काम न आये।
भटक भटक कर तन मन
जब थक जाये।
तो उस द्वार पर जाना
जहां हर बेचैन मन
को चैन।
हर भटकन को
एक साहिल मिल जाता है।
वो द्वार किसी और का नहीं
मेरे ईश्वर का कहलाता है।
                 प्रियंका श्री
                 2/2/18

Friday, February 23, 2018

कुछ लाइने लिखने वालों के नाम

लिखने वालों की भी
अजीब दुनियां होती है
जहां न दुख ,न खुशी की
कमी होती है।

खुद से ही जुड़े होते है
खुद में ही सिमटे होते है
पर जब कलम
चलने को होती है।

तो उसमें कहानी भी
खुद से ज्यादा
औरों की होती है।

ये ऐसे इंसान होते है
जो भाव में निहित
होते है।

कहने वाले तो इन्हें
पागल भी कहते है,
पर ये ऐसे मानव है
जो दूसरों के दुख से
सीधे जुड़े होते है।

इसलिए तो लेखक एक
भावपूर्ण इंसान होते है।
        ~प्रियंका"श्री"
          24/2/18

Wednesday, February 21, 2018

पर्यावरण रहे शुद्ध सदा

दोष मुक्त रहे,
रोष मुक्त रहे,
स्वच्छ रहे सदा,
है जन-जन से यही प्रार्थना
पर्यावरण रहे शुद्ध सदा।

न काला अम्बर हो,
न काली धरती हो,
न दूषित हो जलवायु,
न भटके कोई बीमारी,
गर आसपास हो सफाई सदा।

स्वच्छता का सिर्फ यही आधार,
कूड़ा के लिए हो कूड़ापात्र,
सरकार का सिर्फ ये नहीं है कार्य,
हर जन का है ये अधिकार।

प्रत्येक जन जब इसमें प्रतिभाग करे,
अपनें कर्तव्यों का पूर्णनिर्वाह करे,
तब एक स्वच्छ संसार बसे,
अस्वच्छता तब दूर भगे।
                          ~प्रियंका"श्री"
                             21/2/18


Tuesday, February 20, 2018

तन्हाई

कैसी ये उदासी छाई है
कैसी ये मायूसी आई है
अपनों के बीच हूँ फिर भी
मन में क्यूँ तन्हाई है।

तन्हाई,ये वो तन्हाई नहीं
ये सोच का आभास है
जो दिमाग से लेकर जन्म
दिल में आबाद है।

इस आबादी का आलम
कुछ यूँ छाया है
न घर मे है सुक़ून
न बाहर चैन पाया है।

चैनों सुक़ून पाने को
हम कुछ यूँ भटके है
लोगों के बीच जो न मिला हमें
उसे कब्रिस्तान में हमनें पाया है।
                ~प्रियंका"श्री"
                   20/2/18

Sunday, February 18, 2018

मैं एक राही हूँ इस जग का

मैं एक राही हूँ इस जग का
न  कोई ठौर,न कोई बसेरा।

जग जग घूमूँ , डग डग चूमूँ
फिरता फिरू,बन एक फकीरा।

मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर,न कोई बसेरा।

सखा हुया सूरज अब दखो
दिखलाये हर डग पे सबेरा।

फैली हुई उसकी किरणें
अंतर्मन में भरे उजेला।

मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर, न कोई बसेरा।

दिव्यप्रभा ज्वलित कर जाता
वो भोर का ,है प्रथम सितारा।

राही का पथ दर्शक बन जो
मार्ग उचित दर्शित करजाता।

निभाने अपनी विहित रीत जो
सदैव उदित पूरब से अम्बर पर आता।

मैं रक राही हूँ, इस जग का
न कोई ठौर , न कोई बसेरा।

चाँद की जब चंचल किरणों से
शीतल होता तन मन मेरा।
फैली हुई तारों की रजनी
पेहरी बन कर देती पेहरा।

मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर,न कोई बसेरा।

एकाकीपन से खाली मन जब
विरक्ति के भावों से भर जाता।

धरती का तब प्रत्येक कण
मां बन कर जो, प्रेम आशीष लुटाता।

फैला गगन तब आँचल बनकर
मुझको अपने चित्त लगाता।

मैं एक राही हूँ ,इस जग का
न कोई ठौर,न कोई बसेरा।

अपनत्व भाव से ऊपर उठता
अपना पराया सब विसराता।

हर जन को स्वीय मानकर
आपस मे प्रेम बंटन कर जाता।

सम्पूर्ण जग को निज मानकर
फिरता फिरू बनकर मैं,यूँ ही अकेला।

मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर , न कोई बसेरा

हर बन्धन से होकर मुक्त मैं
उड़ता फिरू खग सा स्वतन्त्र मै
अम्बर, धरा है मेरा डेरा।

मैं रक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर, न कोई एक बसेरा।
                        ~प्रियंका"श्री"
                           12/2/18











Thursday, February 8, 2018

मुझे मेरे अक्स से प्यार है

मुझे मेरे अक्स से प्यार है,
तभी तो,
सजाती रहती हूं अपने चेहरे को।

पर देखो ये निष्ठुर आईना,
मेरे दीदार के बाद भी,
मेरी तारीफों के कसीदे नही पढ़ता।

शायद उसे इल्म है,
मेरे उस चेहरे का,
जिसे मैंने छुपा रखा है,
दुनियां वालो से।
                ~प्रियंका"श्री"

खूबसूरत सा लम्हा

खूबसूरत सा लम्हा अभी गुजरा था यहीं पर,
जब ख्वाबों में तुम्हें अपने करीब पाया था,
पाकर करीब, न जाने क्यूँ बन्द आंखे भी खुल गयी थी
और बिता वो लम्हा ,चेहरे की गुलाबी शर्म और होठों की हंसी से लिपट आया था।
कह गया था मुझसे मेरी ही कहानी जिसे रचा था मैंने मेरे ही मन मंदिर में।
             ~प्रियंका"श्री"
                 2/2/18

Sunday, February 4, 2018

मैंने रिश्तों को बदलते देखा है

मैंने रिश्तों को बदलते देखा है
मजबूरी से नहीं,
जरुरतों के अनुरूप ढ़लते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

पहले गैरों और अपनों में एक भेद था
आज अपनों को गैरों सा बनते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

रिश्ते पहले जो दिलों की डोर से बंधे होते थे
आज उन पर मुखोटों को चढ़ते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

पहले जो मुस्कान सबके हिस्से में थी
उसको भी अब बंटते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

अब तन का भेद नहीं  है
मन के भेदों को जुबां पर चढ़ते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

रिश्ते जो पहले सुख दुख की तराजू पर तौले जाते थे
उनको अब सोने चांदी में तुलते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

बदलते रिश्तों में अपनों को अपनों से खोते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।
                             ~प्रियंका"श्री"
                                11/2/18

Thursday, February 1, 2018

सुना है

सुना है कही तस्वीरे बोलती नही
मेने कहा देखने का अंदाज तो बदलो तस्वीरे भी बोल उठेंगी
         श्री

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...