Wednesday, July 29, 2020

नई शिक्षा नीति

1986 के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था में या उसकी नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया । परन्तु अब नई शिक्षा नीति 2020 का आना एक नई सम्भावनायों को तो दर्शाता है पर क्या 34 साल की इस व्यवस्था में नीतियों को लाना तो आसान है पर व्यवहारिक रूप देना भी उतना ही आसान होगा?। 

नई शिक्षा नीति 2020 का ड्राफ्ट जितना मनोहारी है क्या उतनी ही क्रियान्वित भी होगी। खैर उसमें बताए गए बिंदु बहुत जरूरी है जिनका व्यहारिक रूप में होना जरूरी भी है। 
पर सवाल  कई है।

हमारे देश में शिक्षा को पूजा जाता है। और उसको प्रदान करने वाले शिक्षकों को भी। तो क्या नीतियां बदलना या नई नीतियों को लाना ही अपने कर्तव्य को पूरा करना होगा। क्योंकि यहां पहले जरूरत सरकारी स्कूलों के ढांचे सुधारने की , वहां सारी स्कूली व्यवस्थाएं प्रदान करने की है इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण बात ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति करने की है जो अपनी योग्यता के दम पर उस पद को प्राप्त करे फिर चाहे वे कोई भी जाति ,धर्म, समुदाय या परिवार के हो। क्योंकि आज भी कई ऐसे स्कूल है जहां शिक्षक तो है पर वे योग्य नहीं है और ऐसे कई मामले हम सब के सामने आए भी है। 
नीति में वोकेशनल पाठ्यक्रम की बात की गई है जो बहुत अच्छी है पर अभी के हालात जो गांवों या शहरों के सरकारी स्कूलों की है कितनी सफल होगीं।
ऐसे कई स्कूल है जहाँ बच्चें की मील दूर चलकर जाते है वहां इंड्रस्ट्रीयल इंटर्नशिप की बात बेमानी नहीं कहूंगी पर हकीकत की दुनियां से बेखबर होना जरूर है। 
उच्च शिक्षा की बात हो तो आज भी ऐसे कई कॉलेज है जहां प्रोफेसर ही नहीं है। 
 शिक्षा के क्षेत्र को राजनीतिक क्रियान्वयन से दूर रखना भी बहुत जरूरी है । क्योंकि अक्सर शिक्षा के मंदिर को हमने राजनीति का अखाड़ा बनते देखा है जो न सिर्फ उसकी मर्यादा को खंडित करती है बल्कि छात्रों की सोच को भी। 
ये तो सिर्फ एक मसौदा है जो ये बताता है कि हमें आगे कैसे-कैसे चरणों में बढ़ना है पर असल काम तो है आंतरिक रूप में काम करने की । आशा है कि जैसे ये प्रभावपूर्ण मसौदा आया है ऐसे है शिक्षा को व्यापार और अपने स्वार्थ का ज़रिया बनाने वाले और भी जो कई दोष जो व्याप्त है इसके आंतरिक स्वरूप में उस पर भी विचार किया जाएगा और सुधार भी। क्योंकि देश का भविष्य हमेसा से बच्चें और आने वाली पीढ़ी रही है। यही है देश का आधार। नीतियों को लाना या उसमे सुधार एक कदम को बढ़ाना तो है। पर जिस ज़मीन पर क़दम बढ़ा है उसके ताप को जानना भी उतना ही जरूरी भी है।
प्रियंका"meeraant"
30/7/20

Saturday, July 25, 2020

पापा का साथ

मम्मा पापा कब तक आएंगे?
मेरी प्यारी सी बेटी अभी वक़्त है । पापा 6 बजे तक आते है न । 
हाँ मम्मा । आज पापा आएंगे तो उनको बहुत सारी बातें बताऊंगी।
बेटी को अपनी गोद में बिठा कर मां बोली- बिल्कुल।
बेटी कभी टीवी तो कभी अपनी गुड़िया इन्ही दोनों के साथ खेलती वक़्त गुजारने लगी।
कुछ घंटे बाद उसकी मम्मी का मोबाइल बजा।
हेलो पापा
हाँ बेटा, आप कब तक आ रहे हो।
बस निकल गया हूँ आफिस से, मम्मी से पूछो कुछ लाना है। 
जी पापा
मम्मी पापा पूछ रहे है कुछ लाना है पापा ऑफिस से निकल आये।
मम्मी-नहीं कुछ नहीं लाना।
बच्ची-नहीं पापा कुछ नहीं लाना ,पर मेरे लिए मेरे बिस्किट ले आओगे ।
पापा-हाँ
बड़ी ही बेताबी के साथ बच्ची का इंतेज़ार शुरू होता है
लगभग आधे घण्टे बाद उसके पापा घर आते है।
बेटी बड़ी प्यारी नज़रों से पापा को देखती है और उनके बोले बिना ही दिन भर की सारी कहानी कहना शुरू करती है।
पर इन सब में उसके पापा का ध्यान न तो बेटी पर होता है न उसकी खुशी पर। बस ध्यान और आँखे उनके मोबाइल पर होती है। 
उस नन्ही ज़ान को तो यही अपने पापा का प्यार लगता है। पर ये सब देख रही उसकी माँ आहत हो जाती है।
क्योंकि न तो अब पिता की गोद है जहां सिर रखकर पिता प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेर सके।
न अब पिता की सलाह है जहां सुन बच्चे की बातें वो उसे समझा सके। और न ही अब पिता के साथ बिताया वो समय है ।
कभी कभी सोचती हूँ । हम अपने बच्चों को क्या दे रहे है सिर्फ आदतें । क्या यादें दी है जो असल में जीवन की बहुत बड़ी पूंजी है क्योंकि जब हताशा या निराशा हाथ थामती है तो यही यादें मनोबल देती है। पुराने दौर के हर बच्चे को आज भी अपने पापा के साथ बिताए हर पल याद है। पर क्या आज के परिवार के बच्चों को ये खज़ाना मिला है। पूछिये ख़ुद से ये सवाल और तलाशिये इसके जबाब।
ख़ुद के लिए न सही अब इनके लिए ज्यादा नही थोड़ा सा वक़्त इनको दे दे। इनके ही भविष्य के लिए।
क्योंकि हम तो चले जायेंगे लेकिन दुनियां की हर परिस्थितियों से लड़ने के लिए ये यही रह जाएंगे । उसके लिए हमारा एक दूसरे के साथ बिताया वक़्त ही इन्हें हर मुश्किल से लड़ने की इन्हें ताकत देंगा।
प्रियंका(meeraant)
26/7/20

सकारात्मक सोच

हाल की परिस्थिति जैसी भी हो। आप जैसी भी राहों से गुजर रहे हो चाहे वे ऊबड़ खाबड़ हो , पथरीली हो, कंक्रीट हो या काटों से भरी हो जब भी ऐसी राहों से आप गुजरते है तो केवल दो ही सोच आपको सकारात्मक रख सकती है ।
1 भूत में गुजरा आपका सुखद वक़्त । जो हर चोट के वक़्त ,हर तकलीफ के दौरान जब भी याद आता है तो  होठों पर हल्की ही सही मुस्कान बिखेर देता है। 
2 भविष्य की ओर उठ रहे कदम अर्थात जो मंजिल तय की है उसे पाने की चाह में , उसको प्राप्त कर लेने पर होने वाली खुशी को आत्मसात करना । 
यही जीवन दर्शन है वर्तमान कैसा भी गुजर रहा हो अक्सर इंसान इन्ही दो के बीच फसा रहता है और लड़ता रहता है। बस स्वयं को सकारात्मक रखना ही आपको हर वो खुशी दे सकता है जिसकी चाह कर आप चल पड़ते है।~प्रियंका(meeraant)
              27/8/20

Wednesday, July 1, 2020

वो चार लोग क्या कहेंगे


"क्या कहेंगे लोग वो चार"
जिंदगी इसी डर में गुजर गई,
न तब कुछ थी,
न अब कुछ रह गयी।
रह गयी तो ,बस यही बात,
कि क्या कहेंगे लोग वो चार।
काश! सुन लेती,
थोड़ा सा अपने मन का,
न करती डर ,
उन चार लोगो का,
तो आज मेरी भी ,
एक कहानी होती,
जिसपे दुनियां ये ,
सारी दीवानी होती।
पर वक़्त,
उस पल न था साथ,
पर कहती हूँ,
आप सब से,
मन की यही बात।
जो ठाना है ,
गर तुमने कुछ करने का,
कभी मत सोचना,
उन चार लोगों का ,
फैला देना अपने पंखों को,
आकाश में उड़ते उन परिंदों सा,
चूम लेना गगन सारा,
छू लेना चाँद और सितारा,
बन कर निकला,
एक ध्रुव तारा,
लगे जो ,
आसमान में सबसे प्यारा।
करना वही कहे जो 
दिल ये बात
न सोचना उन चार लोगों का ।
                   प्रियंका "श्री"
                   23/5/18

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...