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Sunday, June 7, 2020

कोरोना नामक महामारी

आज कमरे में बैठे हुए कमरे की खिड़की से बाहर देखा तो हर कुछ मिनट में मुक्ति वाहन दिखाई दिए और देखते ही मन में बस यही भाव आये कि इस महामारी ने ये तो सीखा दिया कि जिस शरीर को लेकर हम स्वयं में रहते है , अपनी भावनओं के लिए अपनों और दूसरों की भावनायों की कद्र करना भूल जाते है, तकलीफ को समझना भूल जाते है, व्यक्तिवादी प्रवृत्ति से पोषित होते जाते है। अर्थात सामाजिकता से दूर इंसान व्यक्तिगत सोच रखने लगता है और जब ये शरीर ही नहीं होता तब सब खत्म हो जाता है।
अक्सर बुजुर्गों  के सानिध्य में रहने वाले सुनते है दुनिया में ऐसे काम करना जिससे लोग तुम्हे जाने के बाद भी याद कर सके। उनकी बातें,उनके अनुभव  पीढ़ी दर पीढ़ी  सबसे लिए  महत्त्वपूर्ण है । जो हमें भौतिक दुनियां में जीने का तरीका सिखाती है जिससे जीना बहुत आसान और सार्थक हो जाता है। अभी भी वक़्त है क्योंकि उम्मीद नही छोड़नी चाहिए इसलिए कृप्या सिर्फ स्वयं को लेकर न सोचे, हो सकता है आपका शरीर इस बीमारी से लड़ने को तैयार हो पर जरूरी नही सामने वाले का भी हो। अब सबके बारे में सोचने का समय है। मदद करें।
महामारी में जिस तरह परिवार अपनों को खो रहे है । भगवान उनको इस दुःख को सहने की शक्ति दे।
प्रियंका श्री
7।6।20

कविता

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