"क्या कहेंगे लोग वो चार"
जिंदगी इसी डर में गुजर गई,
न तब कुछ थी,
न अब कुछ रह गयी।
न तब कुछ थी,
न अब कुछ रह गयी।
रह गयी तो ,बस यही बात,
कि क्या कहेंगे लोग वो चार।
कि क्या कहेंगे लोग वो चार।
काश! सुन लेती,
थोड़ा सा अपने मन का,
न करती डर ,
उन चार लोगो का,
तो आज मेरी भी ,
एक कहानी होती,
जिसपे दुनियां ये ,
सारी दीवानी होती।
थोड़ा सा अपने मन का,
न करती डर ,
उन चार लोगो का,
तो आज मेरी भी ,
एक कहानी होती,
जिसपे दुनियां ये ,
सारी दीवानी होती।
पर वक़्त,
उस पल न था साथ,
पर कहती हूँ,
आप सब से,
मन की यही बात।
उस पल न था साथ,
पर कहती हूँ,
आप सब से,
मन की यही बात।
जो ठाना है ,
गर तुमने कुछ करने का,
कभी मत सोचना,
उन चार लोगों का ,
फैला देना अपने पंखों को,
आकाश में उड़ते उन परिंदों सा,
चूम लेना गगन सारा,
छू लेना चाँद और सितारा,
बन कर निकला,
एक ध्रुव तारा,
लगे जो ,
आसमान में सबसे प्यारा।
गर तुमने कुछ करने का,
कभी मत सोचना,
उन चार लोगों का ,
फैला देना अपने पंखों को,
आकाश में उड़ते उन परिंदों सा,
चूम लेना गगन सारा,
छू लेना चाँद और सितारा,
बन कर निकला,
एक ध्रुव तारा,
लगे जो ,
आसमान में सबसे प्यारा।
करना वही कहे जो
दिल ये बात
न सोचना उन चार लोगों का ।
प्रियंका "श्री"
23/5/18
23/5/18