जिंदगी में मुश्किलें कई हो,
रास्तों पर अड़चने कई हो,
डर कर रुक जाना ये तू नही है
डर कर मर जाना ये तू नही है
मंजिले दूर सही , चलकर आधे रास्ते
टूट जाना ये तू नहीं है
माना साथ नही है कोई तेरे
तो अकेले चलने में डर कैसा
कदम बढ़ा कर चलता तो जा
होगा पीछे एक दिन काफ़िला खड़ा
तोड़ना क्यों है उम्मीदों को
आस ही तो जिंदा रखेंगी
शर्त यही रख खुद से गर
रखी दूजी से तो दर्द देंगी
टकराकर बापिस आना लहरों का
ये उनकी कमज़ोरी नहीं
देख इस तरफ भी तो
बापिस जाकर आना ही तो ताक़त भली
विश्वास की डोर थाम कर
निकल पड़ अब तू भी
खड़े खड़े नही बनते है दोस्त मेरे
पैरों के निशान कभी।
चल बढ़ बढ़ता चल
इस वक़्त को भी तो कह दे अभी
थाम इसकी छड़ी,
भाग जितना भागना है
न रुकेगा अब ये प्रयास कभी
बदलना होगा अब तुझको भी
ढलना होगा अब तुझको भी
चल बढ़ बढ़ता चला
न रुकना न थमना कभी
मीरांत
1/11/20
सामयिक सार्थक लेखन...
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार
ReplyDeleteआभार कुलदीप जी
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