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Sunday, October 4, 2020

बातें रोज़ की-1

दिन रविवार कहने को तो इसका एक अलग ही जलबा होता था जब तक ये मैडम महामारी नहीं आयी थी। पट जब से इन्होंने अपने चरण कमलों को दुनियां भर में पसारा है तब से दिन दिनांक सुबह शाम हर की महत्ता को एक नया ही रुख मिला है। कैसे? तो देखिए पहले तो साप्ताहिक छुट्टी यानी ज़्यादातर रविवार का लोग बेसब्री से इन्तेजार करते थे। पर अब क्या रविवार क्या सोमवार ।।अरे मेरा मतलब है घर पर रहने से अब दिन तारीख़ याद किसे रहती है। 
हाँ जी क्योंकि अब घर ही सब कुछ है न कही घूमना फिरना बस मैं और मेरा घर। पढ़कर काफ़ी हंसी भी आएगी और थोड़ा गम भी पर क्या कर सकते है देवी जी की कृपा है । अरे देवी से मतलब मैडम महामारी से।
पर आज तो लगभग 5 महीने बाद अपने तन मन धन सब से बस सोच लिया कि घर से बाहर जाना है और क्या सोचने के बाद करना है या नहीं ये महान लोग सोचते है मैं नहीं।
तो अपने पति और बच्ची के साथ उठाकर अपनी धन्नो मतलब कार बस चल दिए लॉन्ग ड्राइव पर।
भोपाल से बाहर , घबराइए नही बस थोड़ी दूर तक।
सच कहूँ तो इतने महीनों बाद निकलना मानो अभी अभी काला पानी की सज़ा माफ हुई हो भगवान क़सम यही वाली फीलिंग्स थी। तो जो रोमेंटिक गानों के साथ सफर शुरू किया। यादगार रहा। रास्तों की हरियाली, वो झील का पानी, साफ लंबी सड़के, और तेज धूप । 
क्या मिश्रण था सब का, पर सफ़र जब दिल से जुड़ा हो तो परिस्थिति कुछ भी हो रास्ते आनन्दित लग ही जाते है।
सफ़र के दौरान कुछ जाना तो ये कि जितना सूंदर सफर है उतनी सूंदर मंजिल नही।...आगे की कहानी मेरी जुबानी पर कल
मीरांत
4/10/20

कविता

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