इस दुनियां के रंगमंच पर
कलाकार भी कितनें सयाने होते है,
परिस्थितियों के हिसाब से रूप ,आत्मा
सब बदल देते है,
भूमिकाओं का दौरा खत्म होते ही
असली किरदार अपना लेते है।
आह भी निकलती है तब,
जब गिरना पर्दे का शुरू होता है।
प्रियंका श्री
30।3।20
Showing posts with label रंगमंच. Show all posts
Showing posts with label रंगमंच. Show all posts
Monday, March 30, 2020
क़िरदार
Subscribe to:
Posts (Atom)
कविता
जब जब सोचा आखिरी है इम्तिहान अब । मुस्कुराकर मालिक ने कहा खाली जो है बैठा दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...
-
लिखने वालों की भी अजीब दुनियां होती है जहां न दुख ,न खुशी की कमी होती है। खुद से ही जुड़े होते है खुद में ही सिमटे होते है पर जब कलम च...
-
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है मजबूरी से नहीं, जरुरतों के अनुरूप ढ़लते देखा है मैंने रिश्तों को बदलते देखा है। पहले गैरों और अपनों में एक...
-
जिंदगी में मुश्किलें कई हो, रास्तों पर अड़चने कई हो, डर कर रुक जाना ये तू नही है डर कर मर जाना ये तू नही है मंजिले दूर सही , चलकर आधे रास्ते ...