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Wednesday, August 12, 2020

बचपन और मिट्टी

लोग क्या कहेंगे, छी-छी पैरों को क्यों खराब करना साफ करना पड़ेगा, कपड़े भी खराब हो जाएंगे । जैसे जैसे बड़े होने लगते है ऐसे सवालों का तांता बंधा होता है। खुद की खुशी तब सिर्फ आसपास के लोगों की नज़रों में मिलने लगती है। खुद के लिए जीना मानो भूल ही जाते हो। आज उसे देखकर यही लगा। लगभग 7-8 साल की लड़की , सड़क के किनारे की कच्ची मिट्टी जो बारिश के पानी में गीली पड़ी हुई थी और उस गीली मिट्टी में अपने छोटे-छोटे पैरों को सानती वो लड़की । जिसका ध्यान इस दुनियां में था ही नहीं। कौन क्या देखेगा, क्या कहेगा यहां तक की मां की डांट का भी डर नहीं। चाँद पर जैसे ध्यान चकोर का होता है वैसे ही लगन में लगे हुए थे उसके पैर और गीली मिट्टी । यूँ सने उसके पैरों को देखा और देखा ये खेल जो सिर्फ पैरों का मिट्टी में सनने तक ही सीमित नहीं था बल्कि उस मिट्टी में उसके पैरों के निशान बनाना था। और मुड़ कर उन्हें देखना । ऐसा खेल जिसने मुझे मेरे बचपन की याद में गुजरने को मजबूर कर दिया जहाँ हम तो अपने पैरों  के निशान को घर तक ले कर जाते थे और डांट मार तक खा कर भी अपनी ही बचकानी हरकतों में खुश रहते थे। पर उस वक़्त तक कोई फिक्र नहीं थी। न ही इस तरह की बातें कि -कोई क्या कहेगा ? कानों में गूंजती थी। बस मन था और मन की चंचलता । जिसके अनुसार चलना ही जीवन की असलियत थी। उस बच्ची ने एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया  कि जब मासूम थे  ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातों से अंजान थे तब सिर्फ दुनियां हमारी थी और अपने कामों को करने का हिसाब भी अपना । पर जैसे ही इस दुनिया की मशीन में कदम क्या रखा बस पुर्जे बन गए। जिसे चलना तो है पर दूसरों के हिसाब से न की उस मन से जो जीना जानता था। हंसना जानता था। 
एक बात और सीखी वो थी हम अक्सर अपने कामों को करने के पहले कोई क्या कहेगा। इसका फायदा क्या। कैसा लगेगा न जाने कितने सवालों में उलछ जाते है । सिवाए उस काम के सभी जगह ध्यान दे देते है। उससे जाना की क्यों दुनियां को देखना ? जैसे उसे पता ही नही कौन उसे देख रहा है, कौन नही ,कौन क्या सोच रहा है, कौन नही ? सब बातों से बेखबर खुद में ही मस्त होना। 
अक्सर हम सब अपनी जिंदगी में इतने मसरूफ़ जो जाते है कि जिंदगी की छोटी छोटी बातें भूल ही जाते है। 
एक बार बच्चे की तरह सोच कर देखो। कई सवालों के जबाब बिना चिंता के ही मिल जाएंगे।~ meeraant(मीरांत)

कविता

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