मैंने रिश्तों को बदलते देखा है
मजबूरी से नहीं,
जरुरतों के अनुरूप ढ़लते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।
पहले गैरों और अपनों में एक भेद था
आज अपनों को गैरों सा बनते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।
रिश्ते पहले जो दिलों की डोर से बंधे होते थे
आज उन पर मुखोटों को चढ़ते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।
पहले जो मुस्कान सबके हिस्से में थी
उसको भी अब बंटते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।
अब तन का भेद नहीं है
मन के भेदों को जुबां पर चढ़ते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।
रिश्ते जो पहले सुख दुख की तराजू पर तौले जाते थे
उनको अब सोने चांदी में तुलते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।
बदलते रिश्तों में अपनों को अपनों से खोते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।
~प्रियंका"श्री"
11/2/18
ये तो टूटे दिल की टीस/ कराह लग रही है.
ReplyDeleteशब्द का अद्भुत प्रयोग सीधे मन को छू गए। awesome..
ReplyDeleteशब्दों का अद्भुत प्रयोग सीधे मन को छू गए। awesome..
ReplyDeleteBahut bahut abhar saurabh ji
ReplyDeleteM rang raj ji apne sahi kaha but ye dil dukhane vali sachchayi hai...
ReplyDeleteआजकी हकीकत बयां कर दी आपने प्रियंका जी . खूबसूरत अभिव्यक्ति.
ReplyDeleteजी हाँ सुधा जी ,बहुत बहुत आभार आपका
ReplyDeleteBahut bahut dhanyvad yashoda ji.
ReplyDeleteबहुत खूब... आज के रिश्तों की सच्चाई बयां करती शानदार अभिव्यक्ति....
ReplyDeleteऐसे ही रिश्तों पर आधारित मेरी रचना "हाँ मैने कुछ रिश्तों को टूटते बिखरते देखा है" भी है
आजकल रिश्तों की डोर पहले जैसी मजबूत नहीं रही...
बहुत सुन्दर सार्थक रचना...
Ekdum sahi
ReplyDeleteBahut bahut abhar sudha ji
ReplyDeleteThank u nidhi
ReplyDelete