Sunday, February 4, 2018

मैंने रिश्तों को बदलते देखा है

मैंने रिश्तों को बदलते देखा है
मजबूरी से नहीं,
जरुरतों के अनुरूप ढ़लते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

पहले गैरों और अपनों में एक भेद था
आज अपनों को गैरों सा बनते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

रिश्ते पहले जो दिलों की डोर से बंधे होते थे
आज उन पर मुखोटों को चढ़ते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

पहले जो मुस्कान सबके हिस्से में थी
उसको भी अब बंटते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

अब तन का भेद नहीं  है
मन के भेदों को जुबां पर चढ़ते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

रिश्ते जो पहले सुख दुख की तराजू पर तौले जाते थे
उनको अब सोने चांदी में तुलते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।

बदलते रिश्तों में अपनों को अपनों से खोते देखा है
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है।
                             ~प्रियंका"श्री"
                                11/2/18

12 comments:

  1. ये तो टूटे दिल की टीस/ कराह लग रही है.

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  2. शब्द का अद्भुत प्रयोग सीधे मन को छू गए। awesome..

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  3. शब्दों का अद्भुत प्रयोग सीधे मन को छू गए। awesome..

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  4. M rang raj ji apne sahi kaha but ye dil dukhane vali sachchayi hai...

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  5. आजकी हकीकत बयां कर दी आपने प्रियंका जी . खूबसूरत अभिव्यक्ति.

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  6. जी हाँ सुधा जी ,बहुत बहुत आभार आपका

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  7. बहुत खूब... आज के रिश्तों की सच्चाई बयां करती शानदार अभिव्यक्ति....
    ऐसे ही रिश्तों पर आधारित मेरी रचना "हाँ मैने कुछ रिश्तों को टूटते बिखरते देखा है" भी है
    आजकल रिश्तों की डोर पहले जैसी मजबूत नहीं रही...
    बहुत सुन्दर सार्थक रचना...

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