बचपन से सपनों का सफर शुरू होता है और कहीं न कहीं जब तक जीते है चलता रहता है । इन सपनों के कई रास्ते ऊबड़ खाबड़ भी होते है कुछ इतने चिकने और सरल की कब इनसे होते हम मंजिल तक पहुँच जाते है पता नही चलता और कम समय में ही वो सब कुछ पा लेने वाले कुछ भग्यशाली लोगों में शुमार हो जाते है। पर जिन्हें रास्तों को चुनने में ,चलने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है सपनें पूरे होने की लंबी खुशी का एहसास उनको ही होता है । बचपन में देखे सपने कई बार जवानी तक साथ देते है और कुछ ऐसे होते है जिनका साथ बुढापा भी देता है । पर अगर बात सपनों में भी भेदभाव की करूँ तो अक्सर ये सपनें हमारे समाज मे चिकने रास्तों से अधिकतर लड़कों के हो कर गुजरते है जब तक उनका सपना ऐसा न हो जो उनके परिवार के विरुद्ध हो । पर लड़कियों को सपनें देखने का अधिकार ही लड़ झगड़ कर मिलता है। तो पूरे करने की बात में तो बाकायदा युद्ध छिड़ते है। इन सब के बावजूद भी उनका सपने देखना और उस पर चलना कम नहीं होता।
पर उसे पूरा करने के लिए रास्तों को जितना नुकीला, पथरीला बनाया जा सके हमेशा उसकी कोशिश की जाती है। और यही वजह रही कि कईयों को फ़तेह मिली तो कइयों को जीत। पर सफ़र आसान न रहा था, न है और शायद न रहने वाला है।
उस पर अगर कोई स्त्री शादी के बाद एक पत्नी, मां, बहू, भाभी आदि इन सब रिश्तों से ऊपर उठकर एक औरत के रूप में कुछ करना चाहे तब तो मानलो रास्तों में बारूद बिछ जाएंगे। और अगर घर के लोगों ने सहमति दे भी दी तो उसके लिए उसे कई शर्तों से गुजरना पड़ता है जैसे बच्चे की देखभाल में कोई कमी न हो। घर के काम सब समय पर हो। फिर जो समय बचे उस पर करों जो करना है। पर इन सब के बीच आप किसी से कोई सहायता की उम्मीद न करें। फिर भी अगर ताकत बचे शरीरिक मेहनत कर तो मानसिक मेहनत भी कर लीजिए और अगर जिसका काम न हुआ तो आप कितने थके हुए है इसका एहसास करना जरूरी नहीं है क्योंकि थकावट तो सिर्फ घर से बाहर काम करने वाले लोगों को होती है या बैठे बैठे टीवी देखने वालों को । थकान का नाम नहीं होता है स्त्री के पास।वो हाड़ मांस की बनी ही नही है पता नहीं किस मिट्टी की है इसलिए थकान होना बीमार पड़ना उसके शब्दकोश में नहीं आना चाहिए। यही मानसिकता है अपने समाज की। पर जिस समाज मे एक स्त्री दूसरी स्त्री की तकलीफों को जब तक न समझने का प्रयास करेंगी तब तक हर स्त्री के साथ दोहरा व्यवहार सुनिश्चित है । याद रखियेगा जब तक अकेले लड़ेंगे लोग तोड़ेंगे जिस दिन इकठ्ठे होकर लड़े तो दुनियां अपनी मुट्ठी में होगी। स्त्रीं को इंसान समझे उसकी भावनायों की ,उसके सपनों को पूरा करने में सिर्फ सिर हिलाकर हाँ न करें बल्कि उसके साथ भावनात्मक ,शारीरिक और मानसिक रूप से जुड़े। अगर वो कुछ अच्छा प्राप्त करती है तो यकीन मानिए जब तक जीवित रहती सदा उसके साथ देने वालों के प्रति आदर, प्रेम रखती है।
मीरांत
जी नमस्ते ,
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (३१-१०-२०२०) को 'शरद पूर्णिमा' (चर्चा अंक- ३८७१) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
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अनीता सैनी
विचारणीय आलेख, हरेक को अपने सपनों को पूरा करने का हक होना चाहिए
ReplyDeleteचिंतन परक लेख।
ReplyDeleteसार्थक हैं उपालंभ के साथ।