बात जब महिलायों की आती है तो उन महिलायों पर अकसर चर्चा होती है जो कमजोर है खुद के निर्णय नही ले सकती ,ज्यादा पढ़ी लिखी नही है, स्वतंत्र नही है न ही सोच से और न ही सामाजिक बंधनो से, जो हमेशा पुरुष प्रधान देश में सिर्फ एक ऐसा पुतला बनकर रहती है जो पुरुष के कहे अनुसार ही चलती है। ऐसा वर्ग औरतों का दयनीय ,कमजोर वर्ग कहलाता है वही दूसरी तरफ पढ़ी लिखी, आपमे निर्णय लेने वाली, आत्मविश्वास से भरी, खुद के पैरों पर खड़ी महिलायों का वर्ग है। जिसे मॉर्डन भी कहा जाता है पर अगर दोनों की स्थिति को नापा जाए तो ज्यादा अंतर नही मिलने वाला । और जो अंतर है भी वो ये है कि पढ़ी लिखी महिला जागरूक होती है इसलिए गलत पर आवाज़ उठती है जिसकी वजह से उसे हर बार न जाने कितनी गलियों से , निगाहों से, शब्दों से अपमानित भी होना पड़ता है। बस वह दबती नही तो उसकी चर्चा हो जाती है सब तक एक खबर की तरह पहुच जाती है ऐसा ही अब देखने को मिलता है राजनीति के क्षेत्र में ,पहले भी जहाँ महिलाएं रही है और बड़े बड़े औदों पर फिर भी कभी उनके चरित्र व उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग नही किया गया परन्तु आज कल के नेतायों को न जाने क्यों लगता है कि
महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करके वे उन्हें कमजोर और असहाय महसूस करा सकते है व उन्हें उनके कर्म से दूर करा सकते है?
एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के नेताओं द्वारा एक प्रसिद्व अभिनेत्री व सांसद रही महिला पर की गई टिप्पणी इतनी शर्मनाक थी कि टीवी चैनेल भी उसे mute करके दिखा रहे है क्या यही आज की राजनीति है जो सिर्फ अब अभद्र भाषा ,चरित्र पर धावा बोलकर खुद को निश्छल और साफ बनाना बताती है अगर आपके पास उनके द्वारा किये गए जन कार्यों पर कोई प्रश्न नही है तो ऐसी भाषायों का उपयोग आपके चरित्र व सम्मान को शोभनीय नही लगता ।आप जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि है जब आप ही शालीन और शोभनीय भाषा का उपयोग नही करेंगे तो आम जनता से क्या आशा करते है।
कहते है न जैसा राजा वैसी प्रजा....
अतः महिलाओं से विनती है कि अब उन्हें खुद के लिए कदम उठाने ही होंगे व ऐसी टिप्पणियों के जबाब भी देने होंगे।महिलाएं कही सुरक्षित नही है और यही आज की सच्चाई है ।
प्रियंका श्री
1/7/19
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