सत्ता का लोभ जानना है तो राजनीति से बेहतर कुछ नही
मेरी इस बात से सहमत तो सभी होंगे
वैसे राजनीति से तालुक्क रखने वालों के लिए जितना जरूरी चुनाव के वक़्त वोटर होता है उझसे जरूरी कुछ नही
ये बात ऐसे ही कहि जा सकती अब खुद ही देखिए जब भी चुनाव का आगमन होता है न जाने कितने वादे , कितनी योजनाए , कितने हथकंडे सुनने में आते है जैसे
20 प्रतिशत गरीबों को सालाना 72000 रुपये देने का वादा,
किसानों की कर्जमाफी फलाना फलाना।
ये वादे सुनने में जितने लुभावने लगते है न उतने की कहने में भी
पर जब इनको जमीनी हकीकत पर उतारा जाता है इनकी असलियत तो सामने तभी आती है कि कितने वादों में ईमादारी बरती गई ,कितनो को किताबों में चढ़ाने वाला तथ्य ही बनाया गया।
अब बेचारी जनता भी क्या करे जब वास्तविक मुद्दों पर बात नही कर सकते क्योंकि उन पर अब तक कह कर तो कुछ हुआ नही तो क्यों न अब रेगिस्तान की मरीचिका को ही हथियार बनाया जाए।
इन सब के बीच देखना सिर्फ ये है कि आज की युवा पीढ़ी जो पढ़ीलिखी है भावनात्मक तौर पर काम बल्कि प्रायोगिक तौर पर ज्यादा सोचती है और उसे हर वादे का हर योजना का क्रियात्मक स्वरूप देखना है ,इन सब के बीच कौन अपनी कितनी जुमलेबाजी में आगे निकल
पाता है ये तो चुनाव के परिणाम और भारत की जनता ही तय करेगी ।जब तक मनोरंजन स्वरूप ही ऐसे भाषणों का लुफ्त उठाते रहे।
Tuesday, March 26, 2019
विचार
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कविता
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