21 वी सदी में होने बाबजूद भी आज की महिला जो खुद के पैरों पर खड़ी है ,आत्मनिर्भर है, अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है, जागरूक है, पर ये सब सिर्फ कहने की बातें है जो लिखने में और बोलने में बहुत अच्छी लगती है। पर उसका असल मतलब उस औरत से पूछो जिसमें ये सारी क्षमताएं होने के बावजूद ,उसे घर और कार्यस्थल पर हीन भावना ,मानसिक या शारीरिक हराश्मेन्ट का शिकार होना पड़ता है फिर भी वह लड़ती है खुद के बजूद के लिए, अपनो के लिए ।
फिर भी इस लड़ाई या युद्ध को कई बार प्रत्यक्ष रूप से सामने नही ला पाती । क्योंकि जानती है कि समाज के लोगों के द्वारा उसके ही चरित्र का निर्धारण कर दिया जाएगा या कह दिया जाएगा आदमी जात तो ऐसी ही होती है तुम ध्यान मत दो या इतनी परेशानी है तो काम ,स्कूल,या वो जगह ही छोड़ दो ।
पर मेरा सवाल है ...क्यों ?
क्यों एक स्त्री को ही हर तरफ से बोला जाता है क्यों नही उस दूसरी ओर खड़े इंसान को कटघरे में उतारा जाता है जो उसकी इस स्थिति के लिए कुसूरवार है । मेरा सिर्फ एक ही प्रश्न है-
क्यों है समाज ऐसा?
इसलिए उसे परोक्ष रूप से अपनी लड़ाई लड़नी होती है और इस लड़ाई में यदि उसका परिवार साथ है तो आधी जंग वो जीत जाती है। रही कसर उस तरह के इंसान से लड़ने की तो ,वो मिले घर परिवार के मनोबल से उस जंग में भी फतेह हासिल कर ही लेती है। पर उनका क्या जो अकेली टूटती रहती है जो अपने परिवार को भी नही कह सकती है समाज तो दूर की बात है उनका या तो सर्वस्व खत्म हो जाता है या वो खुद। कितनी अजीब बिडम्बना है न जिस समाज मे हम औरत को देवी के रूप में पूजते है उसको शक्ति का अवतार मानते है सजीव जगत में उसी का हनन करते है क्योंकि इंसान दो मुखोटे में पैदा होता है। जब वह नन्हा बालक होता है तो हर स्त्री को मां बहन दोस्त के रूप में देखता है और दूसरा रूप समाज से परिचित होने के बाद वही मां ,बहन ,और दोस्त रूपी स्त्री उसकी हवस रूपी भूख मिटाने का माध्यम बन जाती है और वो सम्मान ,अपनापन सब नष्ट हो जाता है ।
पर ये सब सिर्फ इसलिए क्योंकि स्त्री चुप रहती है उसे कमजोर समझ कर उसका हनन आसान समझ लिया जाता है पर अब नही अबकी न स्त्री कमजोर है न वासना की वस्तु उसका स्वयं का अस्तित्व है जिसको अब बनाये रखने का जिम्मा उसने खुद उठाया है बस अब समझने की बारी उस समाज के लोगो की है जो स्त्री की न में हाँ समझ लेते है जबकि उसकी न का मतलब ही न होता है
मतलब न न और न।
पर अब तो समाज मे एक नई तरह की किस्म का जन्म हुआ है जिसकी मानसिकता को समझ पाना बहुत मुश्किल है एक ऐसे जानवर का जन्म हुआ है जिसने मासूमियत को भी मार दिया है स्त्री के उस रूप पर वार किया है जिन्हें अबोध बोला जाता है जिन्हें हर रूप में सिर्फ एक अच्छा इंसान ही नज़र आता है ।
जी हाँ समाज का वो रूप जो एक महीने ,6 महीने, 10 ,12 साल के बच्चों को अब चुनते है ये शर्मशार है चाहे कठुआ कांड हो,भोपाल कांड हो ,दिल्ली कांड हो या कोई अन्य राज्य या देश में हो रही हैवानियत हो । इन मासूम बच्चों की मासूमियत को कैसे नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है ,कैसे उनको रोता हुए वो देख पाता है ,क्या उनकी चीखे अपनी माँ या पिता को पुकारती आवाज़ उसकी आत्मा को नही सुनाई देती, क्या उसमे उसे अपने परिवार का मासूम कोई बचपन नही दिखता ,क्या उसे मासूम का दर्द नज़र नही आता। कोई इतना क्रूर कैसे हो जाता है ? और अगर ये सब उसके मजे की वस्तु है तो अब इस समाज को ही अपने आस पास जन्म ले रहे ऐसे जानवरो को पहचानना होगा और उनका सर्वनाश करना होगा। अब कानून को तीव्र होना होगा , फास्टट्रैक कोर्ट जैसी व्यवस्था ऐसे केसों में हमेशा होनी चाहिए ।मेरे विचार में तो ऐसी मानसिकता रखने वालों को तो कानून के द्वारा ऐसी सजा देनी चाहिए ताकि दूसरा करने से पहले सोचे और सोचकर भी ऐसी शर्मशार हरकत न कर सके ।क्योंकि ये खोखली मानसिकता पीढ़ी दर पीढ़ी मासूमियत को मारती जाएगी। और भारत का भविष्य डर की अंधेरी गलियों में गुम हो जाएगा उसका विश्वास इंसान इंसानियत सब से उठ जाएगा जिसको सोचना भी एक भयाभय स्थिति को बताता है असलियत को बयाँ करना मुश्किल है । अतः सरकार द्वारा ऐसे इंसानों में कानून का डर ही अब स्थिति में सुधार लाएगा।
प्रियंका"श्री"
27/6/19
Thursday, June 27, 2019
असुरक्षा का कारण डर का अभाव
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