गुमनाम हुए वक़्त गुजर गया,
चलो,
खुद से खुदको मिलाकर आते है।
बहुत बाँट लिया दर्द को अपने,
चलो,
अब खुद में सिमट जाते है।
मुस्कुराते चेहरों को देखते है
यहां सारे,
ज़ख्म जो तन में है वो,
दिख ही जाते है।
भीतर छुपे दर्द ए नासूर से
चलो,
ख़ुद ही अब रूबरू हो आते है।
ताब ए दर्द कुछ यूँ बड़ चला
है रूह पर,
खुद में ही खुद को अब,
ख़त्म हम कर जाते है।
प्रियंका "श्री"
28/9/19