बचपन तुम्हारा
बहुत याद आता है
प्यार से गोदी उठाना
लोरी गाकर सुनाना
रात रात भर
थपकियाँ लगाना
खुद को जगाकर
तुम्हें सुलाना
बहुत याद आता है।
उंगली पकड़ कर
चलाना
गिरने से पहले उठाना
दर्द में तुम्हारे
स्वयं आँसू बहाना
बहुत याद आता है।
दुप्पटा मेरा उठाना
सिर पर रख उसे
घूँघट बनाना
उसमें छिपकर देख जाना
कोई देखे तो
झूठा शर्माना
चिड़चिड़ा कर मुंह बनाना
बहुत याद आता है।
सोते सोते जाग जाना
छाती से मेरीे लग कर
आँसू बहाना
कहीं छोड़कर मत जाना
बार बार ये दोहराना
बहुत याद आता है।
दोस्तों के अपनी
झूठी शिकायतें लगाना
न मानो तो रूठ जाना
न कभी करने की बात
का वचन खाना
बहुत याद आता है।
अकेले तुम्हारा बाहर जाना
चिंता से मेरे खुद को सताना
लौटने की प्रतीक्षा में
प्रतीक्षारत हो जाना
मन का अधीन होकर
घबराना
बहुत याद आता है।
वक्त पर तुम्हारा न आना
आते ही
तुम्हें डाँटकर समझाना
रोते हुए खुद को संभालना
तुमको अपने गले से लगाना
बहुत याद आता है।
बचपन से ज़बानी की ओर
अग्रसर होना
साथ होकर भी
अंजान होना।
दूर रहना,
अकेले छोड़ देना
पक्की सहेली थी जो
पहले,
उससे मुँह फेर लेना
आहत मन को कर जाता है।
लाचार मन फिर से वो वक़्त,
सुखद यादें दोहराता है
बचपन का तुम्हारी
उन यादों का याद आना
रुला जाता है।
जब बचपन तुम्हारा
बहुत याद आता है।।
~प्रियंका"श्री"
20/11/17
बहुत सुंदर भाव भरी कविता प्रियंका जी👌
ReplyDeleteधन्यवाद श्वेता जी
Deleteपंक्तियाँ} सीधे हृदय को छू जाती हैं
ReplyDeleteसुंदर
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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