सद्गुरु दे हमकों गुरुवाणी
हम भी बैठे सुनते हैं
ज्ञान कहाँ से आये हृदय में
जब हृदय में अवगुण बसते हैं
न सार्थ हो गुरुवाणी का
न सार्थ हो ऐसे सत्संग का
जहां बैठ सुनता हर कोई
अमल नहीं पर करते हैं
प्रियंका"श्री"
11/4/18
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
कविता
जब जब सोचा आखिरी है इम्तिहान अब । मुस्कुराकर मालिक ने कहा खाली जो है बैठा दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...
-
लिखने वालों की भी अजीब दुनियां होती है जहां न दुख ,न खुशी की कमी होती है। खुद से ही जुड़े होते है खुद में ही सिमटे होते है पर जब कलम च...
-
मैंने रिश्तों को बदलते देखा है मजबूरी से नहीं, जरुरतों के अनुरूप ढ़लते देखा है मैंने रिश्तों को बदलते देखा है। पहले गैरों और अपनों में एक...
-
जिंदगी में मुश्किलें कई हो, रास्तों पर अड़चने कई हो, डर कर रुक जाना ये तू नही है डर कर मर जाना ये तू नही है मंजिले दूर सही , चलकर आधे रास्ते ...
वाह!!!
ReplyDeleteक्या बात है...
अवगुण बसे हृदय में ज्ञान कहाँ से आये
बहुत सुन्दर
बहुत बहुत आभार सुधा जी
ReplyDelete