न जाने क्यों?,कैसे ?,चुने थे वो रास्ते,
जिन्हें कहते थे गलत सभी,
वो मासूमियत थी या थी कोई खता ,
जो बढ़ चले थे कदम जहां ,
न जाने क्या कशिश थी वहां,
जो न देख सके काँटों का ज़हान,
चलते चले ,सहते रहे ,गम ए दर्द
जिंदगी का,
मगर न थम सके उन कदमों के निशान,
एहसास ही न हुया की रास्ते गलत थे ,
कदमों के निशान जिनपे चिन्हित हो चले थे,
जब अनुभवों ने अपना जाल बिछाया,
सही गलत का फर्क समझाया,
अचेतन मन मे चेतना का आलोक
जलाया,
सही राह से अवगत कराया,
ये तू ही है जो सदा से मेरे मन मे समाया,
मेरे ईश्वर ने आज मुझे ,
सही मार्गर्दर्शन दिखलाया।
प्रियंका"श्री"
29/8/18
Thursday, August 30, 2018
न जाने क्यों?...
Friday, August 17, 2018
शायरी
कई आशियानें बदलें हमनें तेरी एक तलाश में
अब जब तू मिला है तो दिल को चैन नही है
प्रियंका"श्री"
17/8/18
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कविता
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