न जाने क्यों?,कैसे ?,चुने थे वो रास्ते,
जिन्हें कहते थे गलत सभी,
वो मासूमियत थी या थी कोई खता ,
जो बढ़ चले थे कदम जहां ,
न जाने क्या कशिश थी वहां,
जो न देख सके काँटों का ज़हान,
चलते चले ,सहते रहे ,गम ए दर्द
जिंदगी का,
मगर न थम सके उन कदमों के निशान,
एहसास ही न हुया की रास्ते गलत थे ,
कदमों के निशान जिनपे चिन्हित हो चले थे,
जब अनुभवों ने अपना जाल बिछाया,
सही गलत का फर्क समझाया,
अचेतन मन मे चेतना का आलोक
जलाया,
सही राह से अवगत कराया,
ये तू ही है जो सदा से मेरे मन मे समाया,
मेरे ईश्वर ने आज मुझे ,
सही मार्गर्दर्शन दिखलाया।
प्रियंका"श्री"
29/8/18
Thursday, August 30, 2018
न जाने क्यों?...
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कविता
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जिंदगी में मुश्किलें कई हो, रास्तों पर अड़चने कई हो, डर कर रुक जाना ये तू नही है डर कर मर जाना ये तू नही है मंजिले दूर सही , चलकर आधे रास्ते ...
जीवन यात्रा के कच्चे-पक्के अनुभवों को समेटती मर्मस्पर्शी रचना.
ReplyDeleteबधाई एवं शुभकामनायें.
सुंदर रचना
ReplyDeleteकाफी उम्दा
ReplyDeleteनिमंत्रण विशेष :
ReplyDeleteहमारे कल के ( साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक 'सोमवार' १० सितंबर २०१८ ) अतिथि रचनाकार जिनकी इस विशेष रचना 'साहित्यिक-डाकजनी' के आह्वाहन पर इस वैचारिक मंथन भरे अंक का सृजन संभव हो सका।
आदरणीय "विश्वमोहन'' जी
यह वैचारिक मंथन हम सभी ब्लॉगजगत के रचनाकारों हेतु अतिआवश्यक है। मेरा आपसब से आग्रह है कि उक्त तिथि पर मंच पर आएं और अपने अनमोल विचार हिंदी साहित्य जगत के उत्थान हेतु रखें !
'लोकतंत्र' संवाद मंच साहित्य जगत के ऐसे तमाम सजग व्यक्तित्व को कोटि-कोटि नमन करता है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/
Bahut bahut abhar neetu ji
ReplyDeleteBahut bahut abhar ravindra ji
ReplyDeleteBahut bahut abhar ravindra ji
ReplyDeleteBahut sundar , anubhav
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