गुमनाम हुए वक़्त गुजर गया,
चलो,
खुद से खुदको मिलाकर आते है।
बहुत बाँट लिया दर्द को अपने,
चलो,
अब खुद में सिमट जाते है।
मुस्कुराते चेहरों को देखते है
यहां सारे,
ज़ख्म जो तन में है वो,
दिख ही जाते है।
भीतर छुपे दर्द ए नासूर से
चलो,
ख़ुद ही अब रूबरू हो आते है।
ताब ए दर्द कुछ यूँ बड़ चला
है रूह पर,
खुद में ही खुद को अब,
ख़त्म हम कर जाते है।
प्रियंका "श्री"
28/9/19
आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 28 सितंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
ReplyDeleteवाह
ReplyDeleteबेहद खूबसुरत....
ReplyDeleteबेहतरीन/उम्दा।
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