Saturday, March 28, 2020

सड़कों पर गुजरते लोग

सड़कों पर पड़े कंकणों की ये कैसी ध्वनि थी
जिसमें अश्रु पसीना लहूँ की नमी थी
हर एक कदम को छुआ था जिसनें
कुछ न कर पाने की तड़प थी जिसमें
शायद उसने भी चुभनें की चाह त्याग दी थी
होती भी क्यों नहीं
उनके पैरों में भूख प्यास की जो कमी थी।
प्रियंका श्री
28।3।20

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