आधार है तू मेरा
फिर भी तेरी कीमत नही
देश कोई भी हो
इज्जत तेरी नही
बिन तेरे बड़े से बड़ा काम
भी न हो पाए
पर ये बात नीति निर्धारकों
को कौन समझाए
जिन्हें तो सिर्फ
विकास की होड़ में
बड़े बड़े कारखाने खोलने है
पर सोचा है थोड़ा भी
गर न हो तुम तो ये सिर्फ
मशीनों के ढेर है
फिर भी तेरी गिनती
इंसानों में नही होती
हर मूल सुविधा से वंचित तू
सिर्फ रास्ते तलाशता रहता है
तेरी फिक्र भी किसे होगी
न बल है
न पास जो पैसा रहता है
है वो भी मेहनत जो
कौड़ियों में बिकती है
तेरे पास एक
आस का दीपक है
जो रोज जलता बुझता है
तेरी बदकिस्मती भी देखो
जीवन मरण के इस चक्र में
जीवन भर तू दो वक़्त जून को
फिरता है।
मिलता है आपार धन भी जब
तुझे ,
तब तू मृत्यु से मिलता है
लाचार कमजोर तू
"मजदूर" नाम से बिकता है।
प्रियंका खरे"श्री"
10-4-20
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