Thursday, June 18, 2020

अवसाद

अक्सर वक़्त नहीं है 
बहुत उलछे हुए है
जिंदगी की उलछनों में,
भूल जाते है बस
उन अपनों को,
जो राह देखते है हमारी
कहने को दिल की हर कहानी,
पर होता कहाँ है वक़्त
सिर्फ सुनने उनके दो लबों को,
ये वक़्त रुकता नहीं 
वो शख्श कहता नहीं,
बस जाती है तन्हाई
कुछ यूँ उसके जीवन में,
साथ होते भी ,साथ उनके
कोई रहता नहीं,
थक जाता है जब वो
ये जान कर ,
कोई नहीं है साथ
उनके हालात पर,
वो चुनाव नहीं करता
खुद की मौत के फ़रमानका
बस लड़ नहीं पता 
जिंदगी के अकेलेपन के डर से
और कर देता जीवन दान 
खुद में खुद से लड़ के,
फिर क्या,
जो है वो है ही यहां,
कुछ वक़्त को ठहरकर 
भी ,जो सोच लेता है 
किसी अपने के अवसाद भरे 
जीवन को हर लेता है,
जिंदगी उस अपने की जी जाती है 
बरना ये दुनियां है बाबू ,
चलती है और चलती ही जाती है।
प्रियंका"Meeraant(मीरांत)"
19/6/20



3 comments:

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...