Friday, August 28, 2020

जीवन सत्य

कहानियां कभी काल्पनिक तो कभी वास्तविकता पर आधारित, इन सब के बीच अगर कभी ध्यान गया है उसके अंत पर ,तो अक्सर अधिकतर कहानियों का अंत सकारात्मक ही होता है। और कुछ का नकारात्मक । 
इस कथन को अगर ध्यान से देखे और थोड़ा सोचे । तब क्यूँ? का जबाब मिल जाएगा।
हर कहानी कई उतार चढ़ाव के बीच बुनी होती है । जिसमें अनेक रस, भाव सब ऐसे पुल से गुजरते है जो कभी तो अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्शाता है तो कभी उजाड़, कमज़ोर , जिसका टूटना तय है। 
और इन्ही सब के बीच फंसा पाठक मन की नाव में भाव रूपी समुंदर में डोलता रहता है। 
ऐसे में यदि कहानी का अंत दर्दनाक होता है तो मन रूपी नाव भावों के समुंदर से कभी पार नहीं लग पाती और कहानी और पाठक एक मजबूत बन्धन में बंध जाता है।
यदि कहानी का अंत सकारात्मक हुआ तब कहानी का मुख्य क़िरदार प्रफुल्लित हो उठता है और उसके साथ ही कहानी के पाठक के मुख पर भी ख़ुशी ज़ाहिर हो उठती है। और पाठक निश्चिंत हो जाता है। बिना मन को दर्द दिए।
इन्ही कहानियों जैसे जिंदगी में भी नए किरदारों का आना-जाना लगा रहता है
अगर उनका जाना भी एक सकारात्मक पथ पर हो तो सब ख़ुश।
वही जाना कुछ सवालों के साथ ख़त्म हो तो ज़िंदगी भर का बंधन, उन सवालों के जबाब के रूप में,  जिंदगी भर की निराशा के साथ।~ meeraant(मीरांत)
28/8/20

Saturday, August 15, 2020

आज़ादी

आज़ादी हर देश ,हर राज्य, हर व्यक्ति के लिए सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि इसका एक ख़ास मतलब होता है।
जो उसके मूल आधार से, मूल सुविधाओं से, उसके मूल अस्तित्व से जुड़ा होता है। आज़ादी चाहे विचारों की हो, व्यक्तिगत हो, सार्वजनिक हो चाहता इसे हर कोई है। और हर एक के लिए इसका मतलब भी अलग -अलग होता है। घर की चार दीवारों में बन्द व्यक्ति की आज़ादी उसका खुला आसमान है, दो वक़्त की रोटी पाने वाले के लिए आज़ादी शोषण से मुक्ति है, तो वही किसी के लिए आज़ादी समाज की कुरूतियों से मुक्ति है।
 आज़ादी पशु ,इंसान ,पेड़ पौधों हर किसी को अपने रूप में अपनी सीमाओं के अंदर हर कोई चाहता है। 

अगर बात इस वर्ष की आज़ादी की करें तो हर इंसान अभी सिर्फ इस वायरस से आज़ादी चाहता है ताकि फिर से वो वही जिंदगी जी सके जिसे वो जीता आया है । और कहीं न कहीं इस महामारी के समय ने हम सब को आज़ादी का असल मतलब भी सीखा दिया है। 
और ये भी कि हमारे देश के लिए आज़ादी अभी भी बाकी है। उस सोच की बेड़ियों से जो देश के इतिहास से चलती आयी है 

हमारे धर्म,जाति और समुदाय को लेकर। इन बेड़ियों से आज़ादी की जरूरत है अब हमें । और क्यों न होगी क्योंकि न जाने कितने रहमान, सलीम, अख्तर , राम , मनोज , पवन, इन बेड़ियों की जंजीरों में बंध जाते है और अपने जैसे न जाने कितनों को नुकसान पहुँचा जाते है।

आज़ादी मजदूरों को चाहिए अपनी परिस्थितियों से जिन्होंने उनको ऐसे समय घर से बेघर कर दिया , उनको दाने दाने के लिए मजबूर कर दिया।रोटी, कपड़ा, और मकान के कमी की आज़ादी।

आज़ादी चाहिए हर उस छोटी बच्ची को , औरत को ,लड़की को जो घर से बाहर निकलते ही डर में रहती है । उसके शरीर को ताकती आँखों से, उसके जिस्म को छूते हाथों से, उसके पहनावे और उसके शरीर के अंग पर कसते क़सीदों से , उसके साथ होते अत्याचारों से , उसको इंसान न मानने वाली सोच से।

आज़ादी चाहिए आज हर उस इंसान को जो अपने लिए अपने देश के लिए बहुत कुछ करना चाहता है पर इस सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार से टूट कर बिखर जाता है।

आजादी चाहिए हर उस युवा को जो अपनी सही सोच को पंख देना चाहता है पर गला घोटती रीतियों में कहीं मर जाता है। 
 आज़ादी चाहिए इस पर्यावरण को हम सब से जो इसे मिटाने पर तुले है।

हर साल हम आज़ादी की खुशियाँ मनाते है। इतनी सारी बंदिशों के बाबजूद । क्योंकि हम बदलना जानते है। हम सकारात्मक होना जानते है । हम लड़ना जानते है। हम टूटकर बनना जानते है। हम जानते है वो सब जो देश के हित में है। जो हमारे अपनों के हित में है जो अपने हित में है।

पर एक बात हमेशा ध्यान रहे आज़ादी का मतलब किसी को नुकसान पहुँचाना , उसे कष्ट देना, उसके हितों को समाप्त करना , उसकी सुख शान्ति को नष्ट करना नहीं होना चाहिए। 


क्यों न इस साल से हर साल आज़ादी पर हम सब मिलकर एक एक अपने अंदर की कमी जो किसी दूसरे की आज़ादी को खत्म कर रही है उसे मिटाने की कसम खाये ।~meeraant(मीरांत)
15/8/20

स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं।

Wednesday, August 12, 2020

बचपन और मिट्टी

लोग क्या कहेंगे, छी-छी पैरों को क्यों खराब करना साफ करना पड़ेगा, कपड़े भी खराब हो जाएंगे । जैसे जैसे बड़े होने लगते है ऐसे सवालों का तांता बंधा होता है। खुद की खुशी तब सिर्फ आसपास के लोगों की नज़रों में मिलने लगती है। खुद के लिए जीना मानो भूल ही जाते हो। आज उसे देखकर यही लगा। लगभग 7-8 साल की लड़की , सड़क के किनारे की कच्ची मिट्टी जो बारिश के पानी में गीली पड़ी हुई थी और उस गीली मिट्टी में अपने छोटे-छोटे पैरों को सानती वो लड़की । जिसका ध्यान इस दुनियां में था ही नहीं। कौन क्या देखेगा, क्या कहेगा यहां तक की मां की डांट का भी डर नहीं। चाँद पर जैसे ध्यान चकोर का होता है वैसे ही लगन में लगे हुए थे उसके पैर और गीली मिट्टी । यूँ सने उसके पैरों को देखा और देखा ये खेल जो सिर्फ पैरों का मिट्टी में सनने तक ही सीमित नहीं था बल्कि उस मिट्टी में उसके पैरों के निशान बनाना था। और मुड़ कर उन्हें देखना । ऐसा खेल जिसने मुझे मेरे बचपन की याद में गुजरने को मजबूर कर दिया जहाँ हम तो अपने पैरों  के निशान को घर तक ले कर जाते थे और डांट मार तक खा कर भी अपनी ही बचकानी हरकतों में खुश रहते थे। पर उस वक़्त तक कोई फिक्र नहीं थी। न ही इस तरह की बातें कि -कोई क्या कहेगा ? कानों में गूंजती थी। बस मन था और मन की चंचलता । जिसके अनुसार चलना ही जीवन की असलियत थी। उस बच्ची ने एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया  कि जब मासूम थे  ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातों से अंजान थे तब सिर्फ दुनियां हमारी थी और अपने कामों को करने का हिसाब भी अपना । पर जैसे ही इस दुनिया की मशीन में कदम क्या रखा बस पुर्जे बन गए। जिसे चलना तो है पर दूसरों के हिसाब से न की उस मन से जो जीना जानता था। हंसना जानता था। 
एक बात और सीखी वो थी हम अक्सर अपने कामों को करने के पहले कोई क्या कहेगा। इसका फायदा क्या। कैसा लगेगा न जाने कितने सवालों में उलछ जाते है । सिवाए उस काम के सभी जगह ध्यान दे देते है। उससे जाना की क्यों दुनियां को देखना ? जैसे उसे पता ही नही कौन उसे देख रहा है, कौन नही ,कौन क्या सोच रहा है, कौन नही ? सब बातों से बेखबर खुद में ही मस्त होना। 
अक्सर हम सब अपनी जिंदगी में इतने मसरूफ़ जो जाते है कि जिंदगी की छोटी छोटी बातें भूल ही जाते है। 
एक बार बच्चे की तरह सोच कर देखो। कई सवालों के जबाब बिना चिंता के ही मिल जाएंगे।~ meeraant(मीरांत)

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...