Saturday, October 31, 2020

कदमों के निशान

जिंदगी में मुश्किलें कई हो,
रास्तों पर अड़चने कई हो,
डर कर रुक जाना ये तू नही है
डर कर मर जाना ये तू नही है
मंजिले दूर सही , चलकर आधे रास्ते
टूट जाना ये तू नहीं है
माना साथ नही है कोई तेरे
तो अकेले चलने में डर कैसा
कदम बढ़ा कर चलता तो जा
होगा पीछे एक दिन काफ़िला खड़ा
तोड़ना क्यों है उम्मीदों को
आस ही तो जिंदा रखेंगी
शर्त यही रख खुद से गर
रखी दूजी से तो दर्द देंगी
टकराकर बापिस आना लहरों का
ये उनकी कमज़ोरी नहीं
देख इस तरफ भी तो
बापिस जाकर आना ही तो ताक़त भली
विश्वास की डोर थाम कर
निकल पड़ अब तू भी
खड़े खड़े नही बनते है दोस्त मेरे
पैरों के निशान कभी।
चल बढ़ बढ़ता चल
इस वक़्त को भी तो कह दे अभी
थाम इसकी छड़ी,
भाग जितना भागना है 
न रुकेगा अब ये प्रयास कभी
बदलना होगा अब तुझको भी
ढलना होगा अब तुझको भी
चल बढ़ बढ़ता चला
न रुकना न थमना कभी
मीरांत
1/11/20

Wednesday, October 28, 2020

सपनें

बचपन से सपनों का सफर शुरू होता है और कहीं न कहीं जब तक जीते है चलता रहता है । इन सपनों के कई रास्ते ऊबड़ खाबड़ भी होते है कुछ इतने चिकने और सरल की कब इनसे होते हम मंजिल तक पहुँच जाते है पता नही चलता और कम समय में ही वो सब कुछ पा लेने वाले कुछ भग्यशाली लोगों में शुमार हो जाते है। पर जिन्हें रास्तों को चुनने में ,चलने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है सपनें पूरे होने की लंबी खुशी का एहसास उनको ही होता है । बचपन में देखे सपने कई बार जवानी तक साथ देते है और कुछ ऐसे होते है जिनका साथ बुढापा भी देता है । पर अगर बात सपनों में भी भेदभाव की करूँ तो अक्सर ये सपनें हमारे समाज मे चिकने रास्तों से अधिकतर लड़कों के हो कर गुजरते है जब तक उनका सपना ऐसा न हो जो उनके परिवार के विरुद्ध हो । पर लड़कियों को सपनें देखने का अधिकार ही लड़ झगड़ कर मिलता है। तो पूरे करने की बात में तो बाकायदा युद्ध छिड़ते है। इन सब के बावजूद भी उनका सपने देखना और उस पर चलना कम नहीं होता।
पर उसे पूरा करने के लिए रास्तों को जितना नुकीला, पथरीला बनाया जा सके हमेशा उसकी कोशिश की जाती है। और यही वजह रही कि कईयों को फ़तेह मिली तो कइयों को जीत। पर सफ़र आसान न रहा था, न है और शायद न रहने वाला है। 
उस पर अगर कोई स्त्री शादी के बाद एक पत्नी, मां, बहू, भाभी आदि इन सब रिश्तों से ऊपर उठकर एक औरत के रूप में कुछ करना चाहे तब तो मानलो रास्तों में बारूद बिछ जाएंगे। और अगर घर के लोगों ने सहमति दे भी दी तो उसके लिए उसे कई शर्तों से गुजरना पड़ता है जैसे बच्चे की देखभाल में कोई कमी न हो। घर के काम सब समय पर हो। फिर जो समय बचे उस पर करों जो करना है। पर इन सब के बीच आप किसी से कोई सहायता की उम्मीद न करें। फिर भी अगर ताकत बचे शरीरिक मेहनत कर  तो मानसिक मेहनत भी कर लीजिए और अगर जिसका काम न हुआ तो आप कितने थके हुए है इसका एहसास करना जरूरी नहीं है क्योंकि थकावट तो सिर्फ घर से बाहर काम करने वाले लोगों को होती है या बैठे बैठे टीवी देखने वालों को । थकान का नाम नहीं होता है स्त्री के पास।वो हाड़ मांस की बनी ही नही है पता नहीं किस मिट्टी की है इसलिए थकान होना बीमार पड़ना उसके शब्दकोश में नहीं आना चाहिए। यही मानसिकता है अपने समाज की। पर जिस समाज मे एक स्त्री दूसरी स्त्री की तकलीफों को जब तक न समझने का प्रयास करेंगी तब तक हर स्त्री के साथ दोहरा व्यवहार सुनिश्चित है । याद रखियेगा जब तक अकेले लड़ेंगे लोग तोड़ेंगे जिस दिन इकठ्ठे होकर लड़े तो दुनियां अपनी मुट्ठी में होगी। स्त्रीं को इंसान समझे उसकी भावनायों की ,उसके सपनों को पूरा करने में सिर्फ सिर हिलाकर हाँ न करें बल्कि उसके साथ भावनात्मक ,शारीरिक और मानसिक रूप से जुड़े। अगर वो कुछ अच्छा प्राप्त करती है तो यकीन मानिए जब तक जीवित रहती सदा उसके साथ देने वालों के प्रति आदर, प्रेम रखती है।
मीरांत

Friday, October 9, 2020

बातें रोज़ की पार्ट 2

लगभग 7 महीने बाद आज रेस्टोरेंट में खाने गए थे । बीते महीनों तक या यूं कहें काफी समय तक या तो रेस्टोरेंट बन्द थे या खाने को घर तक के आगमन की सुविधा दे रहे थे। उस वक़्त तक महामारी का डर ज़ोरों पर था। इसलिए खाना घर का ही बेहतर होता है ऐसा चलन शुरू हो गया । अरे इसी सोच ने तो महिलायों को मास्टर सैफ तक बना दिया। 
इन सब को देखते हुए हम भी कुछ ऐसी ही जिंदगी जी रहे थे । और हर खाने की ख्वाहिश घर पर ही पूरी करने की कई बार कामयाब तो कई बार नाकामयाब कोशिशें ज़ारी रहती थी पर न तो कोरोना गया , न ही ख़्वाहिशें ख़त्म। तो अब बचता क्या? इसलिए इतने महीनों बाद सोच ही लिया कि चलो आज चलते है और स्वाद को मज़ा आजायेगा और परिस्थितियों का जायज़ा भी हो जाएगा। अब क्या करे दिमाग़ में पत्रकारिता घुसी ही कुछ ऐसी है तो चल दिये अपनी मंजिल की ओर । 
आखिर सफर ख़त्म हुआ और मंजिल सामने खड़ी थी , सफेद सूट , टोपी पहने लगभग 5.6 इंच की जिसने खुद की सुरक्षा के लिए मास्क और हाथों में ग्लब्स पहन रखे थे और किसी देवता की तरह उसके हाथों में सेनेटाइजर और ताप जांचने वाले यंत्र सुशोभित थे।
ये देखते ही थोड़ी जान में जान आयी कि पहला पड़ाव तो इन्होंने बड़ी ही सफाई से पार कर लिया । अब बारी थी अंदर जाने की पर उसके पहले ही मिला प्रसाद रूपी सेनेटाइजर और सुरक्षा के लिए ताप की जांच।
अंदर जाते ही आँखे ढूढ़ने लगी। अरे बाबा और किसे ,उन लोगों को जो रेस्टोरेंट की शोभा पहले ख़ूब बढ़ाते थे। अब कोई नही मुश्किल से एक दो लोग। और सुरक्षा के हर पुख्ता इन्तेजाम ।
और इस तरह आज का सफ़र जिसकी मंज़िल डोसा थी पूरी हुई।
~मीरांत
9/10/20
#corona
#safety
#रेस्टॉरेंट

Sunday, October 4, 2020

बातें रोज़ की-1

दिन रविवार कहने को तो इसका एक अलग ही जलबा होता था जब तक ये मैडम महामारी नहीं आयी थी। पट जब से इन्होंने अपने चरण कमलों को दुनियां भर में पसारा है तब से दिन दिनांक सुबह शाम हर की महत्ता को एक नया ही रुख मिला है। कैसे? तो देखिए पहले तो साप्ताहिक छुट्टी यानी ज़्यादातर रविवार का लोग बेसब्री से इन्तेजार करते थे। पर अब क्या रविवार क्या सोमवार ।।अरे मेरा मतलब है घर पर रहने से अब दिन तारीख़ याद किसे रहती है। 
हाँ जी क्योंकि अब घर ही सब कुछ है न कही घूमना फिरना बस मैं और मेरा घर। पढ़कर काफ़ी हंसी भी आएगी और थोड़ा गम भी पर क्या कर सकते है देवी जी की कृपा है । अरे देवी से मतलब मैडम महामारी से।
पर आज तो लगभग 5 महीने बाद अपने तन मन धन सब से बस सोच लिया कि घर से बाहर जाना है और क्या सोचने के बाद करना है या नहीं ये महान लोग सोचते है मैं नहीं।
तो अपने पति और बच्ची के साथ उठाकर अपनी धन्नो मतलब कार बस चल दिए लॉन्ग ड्राइव पर।
भोपाल से बाहर , घबराइए नही बस थोड़ी दूर तक।
सच कहूँ तो इतने महीनों बाद निकलना मानो अभी अभी काला पानी की सज़ा माफ हुई हो भगवान क़सम यही वाली फीलिंग्स थी। तो जो रोमेंटिक गानों के साथ सफर शुरू किया। यादगार रहा। रास्तों की हरियाली, वो झील का पानी, साफ लंबी सड़के, और तेज धूप । 
क्या मिश्रण था सब का, पर सफ़र जब दिल से जुड़ा हो तो परिस्थिति कुछ भी हो रास्ते आनन्दित लग ही जाते है।
सफ़र के दौरान कुछ जाना तो ये कि जितना सूंदर सफर है उतनी सूंदर मंजिल नही।...आगे की कहानी मेरी जुबानी पर कल
मीरांत
4/10/20

Friday, October 2, 2020

उम्मीद

#उम्मीद
लोग कहते है जीने के लिए बहुत जरूरी होती है उम्मीद। बिना इसके जीवन मे बहाव कैसा? फिर तो बात वही हो जाती है कि जो है सो है। जैसी धारा है वैसी धारा में ही बहते चलो। पर जब भी जिंदगी ने उम्मीद का दामन थामा है तब से बहुत कुछ बदला और इसका प्रमाण मानव जाति के उत्थान से ही लगा सकते है। सकारात्मक जीवन का एक आधार है ये।
पर एक राज़ की बात बोलू तो उम्मीद जब हमारी सीमा से बाहर हम कर ले तो ये अभिशाप भी है। 
कैसे? तो सुनिए - उम्मीद अक्सर हम अपनों से कर लेते है और कोशिश करते है या आशा करते है कि हमारे अपने उस उम्मीद को पूरा करें। ये बिना सोचे कि जो उम्मीद हम कर रहे है वो पूरी करने वाली भी है या नहीं । या उसके परिणाम क्या होंगे या उस उम्मीद को पूरा करने के तरीके क्या होगें। और यदि पूरी नहीं हुई तो उसका हम पर या हमारे रिश्तों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। ये सब जाने बिना ही उम्मीद किसी दूसरे से लगाना आपके ख़ुद के जीवन के लिए अभिशाप है।
पर अगर में सकारात्मक पहलू की बात करूं तो ये जरूर कहूंगी कि उम्मीद ख़ुद से करना और उसे पूरा होते देखना ही सुखद है बस उम्मीद ऐसी हो जो दूसरों को कष्ट न दे उनको क्षति न पहुँचाये। 
सकारात्मक परिणाम युक्त उम्मीद दूसरों से पहले ख़ुद से करें और उसे पूरा करने की कोशिश भी करें ।ताकि इस एहसास को पा सके कि उम्मीद को पूरा करने के लिए किए गए प्रयत्न आसान नहीं होते।
मीरांत(meeraant)
2/10/20

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...