Friday, February 26, 2021

कविता

भटक गए है कुछ रास्ते मेरे
तलाश ज़ारी है इस घनी आबादी में
हर तरफ जहां दिखता है अंधेरा मुझे
फूटती है रोशनी की किरण उस चारदीवारी में
आसान नहीं होता भूल जाना किसी को
फिर चाहे दुनियां बना क्यों न ले 
वक़्त को मलहम
आता नहीं बिता वक़्त यहां ,जहां रहते है लोग
अपनी होशियारी में
तजुर्बा बहुत हो चुका है इस दुनियादारी का मुझे
तभी रहते दूर है हम अब कीमतों के बाजारों में
यकीन बस इतना है कि मिलना लिखा है मेरा
उससे
चुना है जिसे किस्मत के कारीगरों ने।।
                                मीरांत

शायरी

बुलंद आवाज़ों को भी दुनियां ने जहाँ नज़र अंदाज़ कर दिया
हमने तो वहाँ उसकी खामोशी में छिपे शोर को भी सुन लिया।
                                       मीरांत

कविता

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