भटक गए है कुछ रास्ते मेरे
तलाश ज़ारी है इस घनी आबादी में
हर तरफ जहां दिखता है अंधेरा मुझे
फूटती है रोशनी की किरण उस चारदीवारी में
आसान नहीं होता भूल जाना किसी को
फिर चाहे दुनियां बना क्यों न ले
वक़्त को मलहम
आता नहीं बिता वक़्त यहां ,जहां रहते है लोग
अपनी होशियारी में
तजुर्बा बहुत हो चुका है इस दुनियादारी का मुझे
तभी रहते दूर है हम अब कीमतों के बाजारों में
यकीन बस इतना है कि मिलना लिखा है मेरा
उससे
चुना है जिसे किस्मत के कारीगरों ने।।
मीरांत
जी नमस्ते ,
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२७-०२-२०२१) को 'नर हो न निराश करो मन को' (चर्चा अंक- ३९९०) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
--
अनीता सैनी
बहुत ही उम्दा भावाभिव्यक्ति
ReplyDeleteबहुत सुंदर ।
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteबहुत अच्छी रचना
ReplyDeleteबधाई
आग्रह है मेरे ब्लॉग को भी फॉलो करें
बहुत उम्दा सृजन।
ReplyDelete