सुबह की अलार्म बन कर
खुशियों की चाबी सी
हर मर्ज की दवा बनकर
सुने आंगन की हरियाली सी
रहती सबके साथ हमेशा
फिर भी अनजानी सी
वक़्त बहुत है सुनने को
लफ्जो में क्यों कमियों सी
दूसरों के दर्द में मलहम बनकर
अपने दर्द को क्यों छिपाती सी
एक मकान को जो बना देती
जगमग घर की दीवाली भी
भर्ती जो सबका सूनापन
खुद में सुनी वादी सी
लड़की से औरत और
बीवी से मां तक के सफ़र को
निखारती जो वो है प्यारी सी ~मीरांत
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