Thursday, March 4, 2021

कविता

सुबह की अलार्म बन कर 
खुशियों की चाबी सी
हर मर्ज की दवा बनकर
सुने आंगन की हरियाली सी
रहती सबके साथ हमेशा
फिर भी अनजानी सी
वक़्त बहुत है सुनने को
लफ्जो में क्यों कमियों सी
दूसरों के दर्द में मलहम बनकर
अपने दर्द को क्यों छिपाती सी
एक मकान को जो बना देती
जगमग घर की दीवाली भी
भर्ती जो सबका सूनापन
खुद में सुनी वादी सी
लड़की से औरत और
बीवी से मां तक के सफ़र को
निखारती जो वो है प्यारी सी ~मीरांत

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