Sunday, March 7, 2021

कविता

हर शख़्स में 
छिपी है अनगिनत ख्वाहिशें
जिनमें छिपे है हज़ारों शख़्स
जो आज़ाद होकर 
खुले आसमान में तैरना चाहते है
लगा कर पंख ज़मीन पर उड़ना चाहते है
तालाब में खिले गुलाब की तरह धरती की 
उस मोड़ पर खिलना चाहते है
अद्भुत है जो , करना है उन्हें
न जाने कितनी उन सब असम्भव ख्वाहिशों 
को पूरा जिन्हें नही सोच सकता वो शख़्स जो
जीता है दुनियां में दुनियां के नियमों से बंधकर
दिल की बात नकार कर दिमाग को आगे रखकर
जो भागता है हवा के उन थपेड़ो से
उड़ा न ले जाये उन्हें वो उस दिशा में 
जहां उसका मन तन सब शांत हो
जो मन करे वो बात हो
सुकून से जो जी रहा हो
उम्मीदों से भरा शख़्स बंद उस शरीर का नहीं
उस तन का एहसास हो
जिसे जीना भूल गया था वो
ढूढता है जिसे
वो हर शहर ,हर गली, हर मकान उसके पास हो
मीरांत

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