Thursday, May 6, 2021

कविता

झूठ की कश्ती पर बैठा वो मुसाफ़िर
जाने कहाँ जाने को तैयार है
झूठा रास्ता है जिसका 
उसकी मंजिले भी बेकार है
डोर भी थाम रखी है उसने
काटों से भरी है 
फिर भी कहता है मुस्कुरा कर
जिंदगी मेरी फूलों सी गुलज़ार है
न समझ,
अभी रेगिस्तान की मरीचिका
में है शायद
तभी बंजर ज़मीन  पर भी 
हरियाली दिखती जिसे बेशुमार है~मीरान्त

8 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (०८-०५ -२०२१) को 'एक शाम अकेली-सी'(चर्चा अंक-४०५९) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत आभार अनिता मैम

      Delete
  2. झूठ की किश्ती तो डूब ही जाने वाली है

    ReplyDelete
  3. मृगतृष्णा रीत जाती है.

    ReplyDelete
  4. वाह! अद्भुत है। झूठ को रेगिस्तान की मरीचिका से तुलना कर इसके व्यवहार के हर एक पोल को खोल दिया आपने।

    ReplyDelete

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...