झूठ की कश्ती पर बैठा वो मुसाफ़िर
जाने कहाँ जाने को तैयार है
झूठा रास्ता है जिसका
उसकी मंजिले भी बेकार है
डोर भी थाम रखी है उसने
काटों से भरी है
फिर भी कहता है मुस्कुरा कर
जिंदगी मेरी फूलों सी गुलज़ार है
न समझ,
अभी रेगिस्तान की मरीचिका
में है शायद
तभी बंजर ज़मीन पर भी
हरियाली दिखती जिसे बेशुमार है~मीरान्त
जी नमस्ते ,
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (०८-०५ -२०२१) को 'एक शाम अकेली-सी'(चर्चा अंक-४०५९) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
बहुत बहुत आभार अनिता मैम
Deleteझूठ की किश्ती तो डूब ही जाने वाली है
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteमृगतृष्णा रीत जाती है.
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteवाह! अद्भुत है। झूठ को रेगिस्तान की मरीचिका से तुलना कर इसके व्यवहार के हर एक पोल को खोल दिया आपने।
ReplyDeleteशुक्रिया
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