Thursday, August 17, 2023

इंसानी गुडिया

इंसानी गुडिया नहीं
रखा और रख छोड़ दिया
जाने के बाद लौट आना, 
आकार जाना गलत था 
ये बताना,
बता बता कर फिर करीब आना
ये सही नहीं
मैं कोई बचपन की गुड़िया नही
खेल कर फेंक दिया 
मन भर कर खेल लिया
महीनो सालों सुद न ली 
जब आई फिर याद तो
लताश ज़ारी की
मिली कहीं जब दबी कुचली
कपड़ो को झाड़ा साफ किया
मन भर तक खेल लिया
जीती हुई इंसान हूं मैं
भावों का भंडार हूं मैं
तुम्हारा मन पसंद खिलौना नही
जिसे जब चाहा खेला 
जब चाहा छोड़ दिया
इंसानी गुडिया नहीं
रखा और रख कर छोड़ दिया।।
HHossana
16/8/23

No comments:

Post a Comment

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...