Tuesday, November 19, 2019

मलाल

उनकी महफ़िल में मैंने ,
कितनों को कहते सुना है ,
सियासत के बादशाह ,
वो खुद के हुनर से नही ,
वजीरों की खुशामदों से बने है।
मलाल नही है मुझे,
सोच पे उनकी जो ,
जीत न सके तो ,
अब अफवाहों का,
बाजार ही गर्म कर चले।
काश कुछ वक्त ,
सुकून से बैठ ,
गर सोच लेते ,
खुद के बारे में भी,
तो आज इंसान भी ,
वो बहुत खूब होते।

प्रियंका "श्री"
19/11/19

Wednesday, October 30, 2019

दीवाली

हम शहर को रोशन करने में लगे थे
उनको अपने घर के चूल्हे की फिक्र थी

हम नए पकवानों से बस मुँह छू रहे थे
उन्हें दो वक्त का पेट भी पूरा भरना था

हम नये कपड़ो में इतरा रहे थे इस तरह
वो अपने तन को छुपाने में लगे थे

दीवाली आयी थी हमारे लिए दिखावा लेकर
उनके लिए था त्यौहार कुछ पाने की आस का।
                             प्रियंका"श्री"
                             30/10/19

Friday, September 27, 2019

रूबरू

गुमनाम हुए वक़्त गुजर गया,
चलो,
खुद से खुदको मिलाकर आते है।

बहुत बाँट लिया दर्द को अपने,
चलो,
अब खुद में सिमट जाते है।

मुस्कुराते चेहरों को देखते है
यहां सारे,
ज़ख्म जो तन में है वो,
दिख ही जाते है।

भीतर छुपे दर्द ए नासूर से
चलो,
ख़ुद ही अब रूबरू हो आते है।

ताब ए दर्द कुछ यूँ बड़ चला
है रूह पर,
खुद में ही खुद को अब,
ख़त्म हम कर जाते है।
             प्रियंका "श्री"
             28/9/19

Thursday, September 19, 2019

खटलापुरा घाट की घटना अप्रत्याशित या व्यवस्था में हुई चूक।


सवाल कई है। और जवाब सिर्फ कागजों पर ।ऐसे में लोगों का ग़ुस्सा जायज होता है। और होना भी चाहिए जब इन सवालों का जवाब हमेशा इंसानों की जान से जुड़ा हो।
कहते है कि भूतकाल में हुई घटनाएं सदैव मानव के वर्तमान और भविष्य को सचेतने का कार्य करती हैं। अगर ये सत्य है, तो आधी रात को भोपाल के खटलापुरा घाट पर वह घटना न होती जिसने इतने माओ के आँचल को ,परिवार के सहारों को ,हमेसा के लिए शांत कर दिया । 14 सितम्बर की वह रात एक काली रात की तरह भोपाल के पिपलानी स्थित 100 क्वार्टरस के घरों से उनके लालों को अपने आगोश में ले गयी और छोड़ गई उनके पीछे रोते- बिलखते उनके परिवार व दोस्तजन ।
उन युवाओं की आखिर गलती क्या थी? 
सिर्फ यही की 11 दिन के गणेश पूजन के बाद वे गणेश प्रतिमा का पूरी खुशी के साथ विसर्जन भी करना चाहते थे या  प्रशासन पर उनका विश्वास। कि प्रशासन के द्वारा किये गए इंतेज़ाम इतने पुख्ता है कि उन्हें डरने की आवयश्कता ही नहीं । शायद इसलिए पिपलानी स्थित क्वार्टरस 100 की "नवरात्रि गणेश उत्सव समिति" के युवाओं की टोली, 13 फिट ऊँची गणेश प्रतिमा लेकर विसर्जन के लिए "खटलापुरा घाट" पर करीब 3:30 बजे पहुँची,और विसर्जन की तैयारियों में जुट गई। तब किसे पता था? कि प्रतिमा के साथ क्या-क्या विसर्जित होने वाला है। और हुआ भी वही जिसकी कोई कल्पना भी नही करना चाहता।
जो एक संवेदनहीन और जानबूझ कर घटित होने वाली घटना थी। जिसमें दो नावों पर सवार कुल 22 लोगो मे से जिनमे 17 युवा और 5 नाविक थे उनमें से 11 युवा दोनों नाव का सुंतलन बिगड़ने से तालाब में डूबने से मृत्यु को प्राप्त हो गए।
इसे संवेदनाहीन इसलिए कहा क्योंकि जिस तरह वे नाविक अपनी जान बचाने के लिए खुद तैरक सुरक्षित पहुँच गए वही कुछ मासूम डूबते चले गए ।जबकि वे डूबते हुए बच्चों में से कइयों की जान बचा सकते थे ,पर वहां संवेदना खुद के प्रति ज्यादा दिखी ।वही प्रशासन की लापवाही का एक और खेल देखने को मिला । ऐसे कई बिंदु है जो प्रशासन को लोगो की नज़रों के कठघरे में खड़ा करता है जैसे
कलेक्टर के द्वारा धारा 144 के तहत दिए आदेशों का पालन न होना।
शाम 7 के बाद वोट  का संचालन बंद था,तो प्रशासन द्वारा इसकी अनदेखी क्यों कि गयी?
वोट में लाइफ जैकेट और सेफ्टी ट्यूब क्यों नही थी?
इतने सारे लोगो को एक साथ वोट में बैठने क्यों दिया गया?
बड़ी मूर्तियों के विसर्जन के लिए जब दूसरे घाट तैयार किये गए थे तब प्रशासन के लोगो ने इस घाट में आने की अनुमति क्यों दी?
बिना अनुमति प्राइवेट वोट कैसे घाट में मौजूद होकर काम कर रहे थे?
वही पुलिस,आपदा प्रबंधन, और निगम की सतर्कता में कमी क्यों आयी?
जब उस स्थान पर 52 पुलिस जबानों को तैनात किया गया था। तब घटना के वक़्त 25 पुलिसकर्मी गायब क्यों थे?
वही जब एसडीईआरएफ ने घाट पर मॉकड्रिल के दौरान 8 वोटों को उतारा था तो घटना के वक़्त सिर्फ 1 वोट ही क्यों थी और वो भी गश्त पर न होकर एक जगह खड़ी थी ?
और एसडीईआरफ के जवान क्यों तैनात नही थे? यदि जबान वोट के साथ तैनात होते तो शायद आज 11 जानें बच गयी होती।
वही निगम की बड़ी लापवाही सामने भी आई
कि घाट पर लगभग दो दर्जन नावों का अवैध रूप से संचालन कैसे हो रहा था ? जबकि इसकी जिम्मेदारी प्रशासन और पुलिस की थी कि वे अवैध रूप से नावों को संचालित होने से रोके।
वही बड़ी मूर्तियों के विसर्जन के लिए क्रेन की व्यवस्था यदि थी जो 10 फिट किनारे पर ही मूर्तियों की विसर्जित कर देती ,तो नाव को अंदर जाने की अनुमति कैसे मिली?
वही यह सवाल भी आता है कि घाट पर जब यह घटना घटित हुई तब गोताखोर क्यों नही थे ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एनजीटी द्वारा यह निर्देश दिए गए थे कि 6 फिट से ज्यादा बड़ी मूर्तियां नही बनेगी तो प्रबंधन ने इस पर संज्ञान क्यों नही लिया। शहर में बड़ी मूर्तियां कैसी बनी?
ये सारे ऐसे सवाल है जो प्रशासन को ,पुलिस को,और हर उस अधिकारी को दोषी मानते है जिन्होंने लोगो की जिंदगी से खेलने का जुम्मा उठाया। और उसकी भरपाई भी करी तो परिवारों को 13 लाख रुपये की राहत राशि देकर । मेरा एक सवाल हमेशा से रहता है क्या कोई भी राहत राशि उस घर के हँसते खेलते माहौल को फिर लौटा सकती है जवाब सबके पास है।बस तकलीफ इस बात की है कि क्यूँ प्रशासन किसी बड़ी घटना के घटित होने के बाद ही कठोर निर्णय लेता है और पूरी  सुरक्षा के इंतेज़ाम करने का फिर वही आश्वासन भी देता है। जिसमे से कई तो कागजों पर ही सुचारू रूप से चलित दिखते है बस हकीकत कुछ अलग होती है। मैंने जैसे पहले कहा था कि भूतकाल मानव को हमेशा सचेत करता है फिर वही भूल न करने के लिए। तो भी इंसान नही सचेतता । और यही इस घटना में भी देखने को मिला।
प्रशासन 2016 में हुई घटना से पूरी तरह से वाकिफ था इसलिये शाम के वक़्त नाव या वोट को पानी मे उतारने की मनाही थी। फिर भी इस आदेश को मानने की जरूरत नही समझी गयी। अगर हर एक अधिकारी अपने दायित्वों को पूरी जिम्मेदारी से निभाता तो एक साथ 11 घरों के रूदन की आवाज़ से हर किसी का हृदय यूँ फट नही रह होता। काश! जिन व्यवस्थाओं को भोपाल प्रशासन अब नवदुर्गा के आने के पहले करने को तैयार है उस वक़्त कर देता तो आज ये दु:ख का माहौल न होता।
प्रियंका खरे"श्री"
एमसीयू,भोपाल

Saturday, August 3, 2019

फ्रेंडशिप डे

मैं दिन तारीख के मामले में बहुत भुलक्कड़ हूँ ।हमेशा भूल जाती हूँ। रात को सोते हुए जब मोबाइल की स्क्रीन पर व्हाट्सएप्प ,मेसेंजर के आइकॉन दिखाई दिए तो लगा रात के 12 बजे के बाद ये संदेश कौन भेज रहा है देखा तो पुरान- नए सभी दोस्तों के फ्रेंडशिप डे विश करने के मैसेज थे ।देखकर खुशी हुई और नींद मेरी ,कहाँ भाग गई पता ही नहीं चला ।
पता खुशी क्यों हुई ? क्योंकि आज की भागदौड़ वाली लाइफ में जहाँ हमारे पास खुद के लिए वक़्त नही ,ऐसे में अपनों के लिए निकाल पाना मुश्किल होता है। पर इसके लिए पश्चिमी सभ्यता का आभार ,जिसने इन दिनों को घोषित करके उस कमी को भी दूर करने की पूरी कोशिश की।हालांकि हम भारतीयो को ऐसे दिनों की जरूरत पहले कभी नही पढ़ी, क्योंकि हम दिलों से जुड़ने वाले लोग है जो अच्छे बुरे हर समय अपनों को याद कर लेते है पर शायद इस चलन का अब बढ़ना इस बात को तो इंगित करता है कि शायद अब समय की मांग ही यही है । और मनुष्य होने के नाते समय के अनुरूप ढलना ही हमारा कर्तव्य भी । और हम सब ढल भी रहे है ।
पर आज भी जब मम्मी पापा की अपने ज़माने की बातें सुनती हूँ तो यही लगता है कि रिश्ते तो लोग उस वक़्त जीते थे। अब तो हम सिर्फ औपचारिकता ही कर रहे है । जब भी पापा से बात होती है पापा बताते है कि किसी भी वक़्त उनके दोस्त घर आ जाते थे और घंटों बातें हुआ करती थी। मम्मी कहती है कि पापा के दोस्तों से ही पापा के सीक्रेट मम्मी को पता चले और उस वक़्त पापा का ये कहना "हाँ सब कह दो भाभी को और लगा दो आग" कितने मज़ेदार पल होते होंगे न ।
मैं भी ऐसी ही दोस्ती की कमी का अनुभव करती हूं । जहाँ अपनो के लिए वक़्त हो, बातें हो ,मतलब मोबाइल पर नही सामने बैठ कर ढेर सारी बातें और मोबाइल उस वक़्त कहाँ हो किसी को पता ही न चले ,फिर से बचपन ,ज़वानी के दिनों में खोना ,कितना रोमांचक होगा न।
तो चलिए न ,इस फ़्रेंडशिप डे हम सिर्फ व्हाट्सअप ,कॉल मेरा मतलब है इस वर्चुअल दुनियां से दूर होकर अपने दोस्तों से खुद रूबरू क्यों न हो जाये ?उसने उनके हालचाल की पूरी दास्तान क्यों ले ली जाए, कुछ उनकी तो कुछ अपनी क्यों न कह दी जाए, प्यार गर बाँटने का नाम है तो चलो आज अपनों से बाँट ही लिया जाए।
सब रास्ते जब खत्म हो जाते है
खुल जाता है दरवाज़ा उसका
जिसको लोग दोस्त बुलाते है
मेरे सभी पागल दोस्तों को ,जिन्होंने मेरे मूडी मन को समझा और मुझे संभाला ...हैप्पी फ्रेंडशिप डे... हम तो आज ही मिलेंगें अपने जिगर के टुकूड़ों से...💐💐💐💐।
प्रियंका "श्री"
4/8/19

Tuesday, July 23, 2019

मजबूत लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना जरूरी


कहते है जब तराजू  के दोनों पलड़े समान होते है तभी वस्तु का भार और मोल सही लगता है। यही बात हर परिस्थिति में उपयुक्त होती है फिर चाहे बात सत्ता की ही क्यों न हो?
वहां भी तराजू के दोनों पलड़े अर्थात पक्ष और विपक्ष का सही अनुपात में होना व विशेष रूप से विपक्ष का मजबूत होना एक सही लोकतंत्र की न सिर्फ मांग होती है यही उसका आधार भी है| जो सरकार की कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलाने में मददगार सिद्ध होता है| 11 मई से 19 मई तक 17 वी लोकसभा के लिए हुए चुनाव के बाद जो परिणाम 23 मई को आये जिसके तहत एनडीए ने बहुमत के साथ जीत दर्ज की तथा काँग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा।उसके बाद से काँग्रेस की जो भी हालत देखने को मिल रही है उससे लोकतंत्र का सुचारू रूप से चलना खतरे की निशानी को दर्शा रहा है | जिस प्रकार से किसी भी प्रतिस्पर्धा में हार-जीत का होना उतना ही तय होता है, जितना कि सुबह-शाम का होना । उसी प्रकार से चुनाव में भी हर जीत होती है परन्तुं महत्वपूर्ण होता है हार के बाद भी लोकतंत्र में खुद के अस्तित्व को बनाये रखना व उसके लिए सदैव कार्य करते रहना। परन्तु जिस तरह की आशंकाए,घटनाएं एक राष्ट्रीय पार्टी (कांग्रेस) में हो रही है उसको देख कर तो यही लगता है कि या तो वह अपनी हार स्वीकार ही नही कर पा रही है या अपने दायित्वों से दूर भाग रही है जहां काँग्रेस को एक मजबूत विपक्ष के रूप में सरकार की नीतियों ,कार्यशैलियों तथा कार्यप्रणालियों पर अपनी पैनी नज़र रखते हुए उनका समर्थन व विरोध करना चाहिए । वह यह न करते हुए ,अपने ही पार्टी के भीतर चल रहे द्वंद से गुजर रही है इस वक़्त जहां काँग्रेस ,अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी को एक महत्वपूर्ण भूमिका के साथ विपक्ष को मजबूत बनना चाहिए वे स्वयं को पार्टी से अलग कर रहे है या यूं कहूँ उन्होंने अलग कर दिया है पर क्या ये सही वक्त है इस तरह की गतिविधियों का। उनके इस्तीफे के बाद जिस तरह से कांग्रेस के कई मंत्रियों, विधायकों द्वारा इस्तीफे दिए जा रहे है और जिस तरह से कर्नाटक और गोवा में पार्टी की स्थिति बिगड़ रही है यह काँग्रेस के लिए चिंता का विषय होना चाहिए । इससे तो यही लगता है कि काँग्रेस विपक्ष की भूमिका निभाना नही चाहती ।वह सिर्फ स्वयं को सत्ता में पक्ष या सरकार के रूप में देखना उचित समझती है । यदि ऐसा नही तो ये इस्तीफों का दौर क्यों? 28 दिसंबर 1885 को स्थापित पार्टी का 134 साल बाद इतनी कमजोर व संकट की अवस्था मे  होना  अत्यंत चिंताजनक स्थिति को उजागर करता है। जहाँ पार्टी को आत्ममंथन व हार के कारणों के बारे में सोचना चाहिए ,वहां इस तरह की प्रतिक्रियाएं न सिर्फ चौकाने वाली अपितु एक कमजोर पार्टी को दर्शाती है जो भारत के लोकतंत्र के लिए सही नही है । क्योंकि ऐसी स्थिति में केवल एक ही पार्टी का स्वायत्त अत्यंत खतरनाक सिद्ध हो सकता है यह समय है मजबूत विपक्ष के रूप में मजबूती के साथ सत्ता के कार्यो को देखने व समझने का। अतः काँग्रेस पार्टी को अब राहुल गांधी को मनाने में समय व्यर्थ न करते हुए ,अपना न सिर्फ अध्यक्ष चुनना चाहिए बल्कि आने वाले अन्य विधानसभ चुनाव जैसे महाराष्ट्र, पंजाब,हरियाणा, दिल्ली,उत्तरप्रदेश आदि को जीतने की रणनीतियों पर भी अब ध्यान देना जरूरी है । क्योंकि अब वक्त स्वयं को पुनः स्थापित करने का है न कि हर दायित्व से दूर भागने का। आशा है काँग्रेस जल्द ही अपना अध्यक्ष चुनकर पार्टी के कार्यों को सुचारु रूप से शुरू कर देगी तथा पार्टी के अंदर चल रहे द्वंद भी समाप्त हो जायेंगे।
लेखिका
प्रियंका खरे"श्री"
12/7/2019

Sunday, July 14, 2019

वो कौन थी

वो कौन थी
आज वो कौन है
सिकन है ये कैसी
माथे पे उसके,
अनजान हो गये
चेहरे की, वो खुशी ,
वो कौन थी
आज वो कौन है।
लिपटी है खुदमे
या खुल सी गयी है
मासूम सी मायूस सी
कली
वो कौन थी
आज वो कौन है।
लफ्जों में बंधी है
पढ़ी गयी है अर्थों में
अनसुलझी सी
एक अनजान पहेली
वो कौन थी
आज वो कौन है।
ख़्वाओं में देखा था जिसे
ख्वाहिस थी जिसकी
अधूरे ख्वाब से रह गयी
वो कौन थी
आज वो कौन है
आँसुयों की सच्चाई है
या बंद लबों के शब्द
जानता था मैं जिसे
वो कौन थी
आज वो कौन है
लड़कपन सा था जिसमे
सयानी फिर भी दिखती थी
रहती थी जो अपने धुन में
वो कौन थी
आज वो कौन है
समझा जिसे न तब कोई था
न अब कोई समझ सका
मीलो चलते रास्ते सी
अजनबी,
वो कौन थी
आज वो कौन है
   प्रियंका श्री
  14/7/19

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...