मन में चल रहा संवाद जिसने भारत माँ को भी माँ कहने पर आपत्ति जताई है । वो संवाद कुछ इस तरह के है।
मत कहो मां मुझको
जब बदहाल किया मेरे रूप को।
न किया उसका सम्मान
रोद दिया उसको।
मेरी जय कहते हो
घर ,बाहर उसको दंड देते हो।
नारी ने नर जन्म दिया
तुम पर सर्वस्व लुटा दिया।
हर एक रूप के अस्तित्व को
तेरे लिए मिटा दिया।
पर जब मांगा अपने लिए
नर ने उसे ठुकरा दिया।
न दिया मां को सम्मान
न पत्नी को प्यार दिया।
न बहन के ख्वाहिशों
को उड़ने का साहस दिया।
मार दिया अपने हाथों
जिस बेटी को जन्म दिया।
नर ने अपने नर अहम में
नारी मन अनुभूति को जला दिया।
नारी की शक्ति के बिना
तू जग में कुछ भी न रह जायेगा।
क्यों नही समझता ये नर
तेरा अस्तित्व ही मिट जाएगा।
जब तक शक्ति है सहन की
सब सहन कर जायेगी।
मत करना अपनी सीमा पार
वरना चण्डी बन जाएगी।
अगर है बुद्धि तुझमे
कह रही ये कवि।
सँभल जा जो अगर
है प्यारा तुझे अपना जीवन यही।
प्रियंका"श्री"
मत कहो मां मुझको
जब बदहाल किया मेरे रूप को।
न किया उसका सम्मान
रोद दिया उसको।
मेरी जय कहते हो
घर ,बाहर उसको दंड देते हो।
नारी ने नर जन्म दिया
तुम पर सर्वस्व लुटा दिया।
हर एक रूप के अस्तित्व को
तेरे लिए मिटा दिया।
पर जब मांगा अपने लिए
नर ने उसे ठुकरा दिया।
न दिया मां को सम्मान
न पत्नी को प्यार दिया।
न बहन के ख्वाहिशों
को उड़ने का साहस दिया।
मार दिया अपने हाथों
जिस बेटी को जन्म दिया।
नर ने अपने नर अहम में
नारी मन अनुभूति को जला दिया।
नारी की शक्ति के बिना
तू जग में कुछ भी न रह जायेगा।
क्यों नही समझता ये नर
तेरा अस्तित्व ही मिट जाएगा।
जब तक शक्ति है सहन की
सब सहन कर जायेगी।
मत करना अपनी सीमा पार
वरना चण्डी बन जाएगी।
अगर है बुद्धि तुझमे
कह रही ये कवि।
सँभल जा जो अगर
है प्यारा तुझे अपना जीवन यही।
प्रियंका"श्री"
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