शरद ऋतु का महीना आ चुका था हल्की हल्की धूप जहां खुले बदन को गर्मी पहुँचाती ,वही रात की चलती हवाएं ठंड में जमा जाती ।कुछ ऐसे ही पलों को महसूस करते बानो और उसके बाबा।दिन भर भीख मांगकर जो कुछ भी मिल जाता उससे रात में अपना पेट भरते ।पर इतना कहाँ होता कि दो वक़्त का भी पेट अच्छे से भर जाए।कभी कभी तो हद हो जाती जब पूरा पूरा दिन भीख माँगकर भी इतना न मिलता की उदर की आग को दोनों शांत कर सकें।ऐसे में काम आता बस्ती में लगा हैंडपंप ,वही एक आखिरी सहारा बचता। बानो और उसके बाबा दोनों ही एक दूसरे की दुनियाँ थे। जहाँ बानो एक खिली हुई कली से फूल बनने की राह चल रही थी वही उसके बाबा अपनी ढलती उम्र को लेकर आगे बढ़ रहे थे।कहने को बानो एक भिखारी थी पर उसका गोरा चिट्टा रंग उस पर किशोरावस्था की झलकियाँ उसे और मोहित बना रही थी ।अपनी बढ़ती बेटी की चिंता हर पिता की तरह उसके बाबा को भी थी ।पर इस दुनिया मे जहाँ भीख का अंधेरा था वही उसके बाबा की आंख में अंधेरा छुपा था।बनो ही अपने अंधे बाबा का आखिरी सहारा थी या यूं कहूँ उनकी लाठी। अपने अंधे पन और पेट की भूख से परेशान जब उसके बाबा तिलमिला जाते हमेशा खुद को कोसते और बड़बड़ाते रहते बनो की जिंदगी खराब हो गयी ।एक तो भीख माँगकर खाना उस पर मेरे जैसे अंधे की देखरेख ,कभी कभी तो बानो को खुद से अलग होने को कह देते और कभी कभी मरने की बात कह जाते ।पर इसमे उनका गुस्सा नही अपनी बेटी बनो के लिए प्यार व उसके भविष्य का ख्याल होता जो बोलते बोलते उनका मन टूट जाता और आंखों से बह उठता ।बानो ये सब समझती थी इसलिए जब बाबा गुस्सा करते कभी कभी वो चुपचाप सुनती, वो रोते तो एक माँ की तरह चुप कराती,और कहती बाबा तुम नही होगे ,तो क्या मैं इस दुनियां में जी पाऊँगी ।मुझ गरीब को लोग दो वक्त की रोटी के लिए भी नोच जाएँगे। सत्य बात तो है उसका बाबा भी उस सब बातों से भली भांति परिचित था।
इस तरह दोनों का जीवन किसी तरह कट रहा था। पर विधाता के लिखे लेख कोई नही जानता ,भीख मांगते हुए अचानक बानो को प्यास लगी और वो पानी लेने अपने बाबा को सड़क किनारे बैठाकर दूसरी ओर चली गयी। इसे उसकी किस्मत कहूँ या मानव को मानवता की नज़र न रखने वाला कहुँ एक भीख माँगने वाली लड़की भी कब से ऐसे लोगो की नज़र में होगी कोई नही सोच सकता था । जब काफी देर तक बानो न लौटी तो उसके बाबा परेशान हो गए ,और इधर उधर सड़क पर दौड़ते भागते बनो बनो चिल्लाने लगे अंधे होते हुए भी जो मिलता उसे पकड़ कर पूछते मेरी बनो को देखा मेरी लाठी मेरी बेटी कहाँ चली गयी तू पानी पीने गयी थी अभी तक न लौटी । उनकी वेदना का अहसास किसी को न था । फिर भी पास के कुछ भिखारी उन्हें पुलिस थाने ले गए । और वहां उनकी बेटी उनके एकमात्र सहारे की रिपोर्ट करायी । पर इन सब की सुध उस बूढ़े को कहा वो तो अपनी बानो को पुकारता रहा ,मानो उससे उसका जीवन छिन गया हो ।पुलिस ने भी उस बूढ़े को ढांढस बधाते हुए कि बहुत जल्द वो उसकी बेटी को खोज निकालेंगे और वो अब घर जाए, थका हारा बूढ़ा भी कहाँ मानने वाला वह उसी जगह जाकर अपनी बिटियां को आवाज़ लगाने लगा , बीच बीच मे भगवान से दो पल के लिए अपनी आँखें मांगता ताकि बानो को ढूढ़ सके।भागते चिल्लाते पुकारते कब दिन से रात हो गयी उन बुझी हुई आँखों को क्या पता , न तो भूख का होश न प्यास का बस मन बार बार कान को ऊँचा करता कहीं से तो बानो की आवाज़ सुनाई दे। पूरी रात बीत गयी और बानो का कोई अता पता नही । उसके बाबा भी उसी सड़क किनारे उसका इन्जार करते रहे ।
जिस भीख के लिए वे यहाँ वहाँ भटकते थे अब वही भीख उसकी हालत देख लोग यूँ ही दे जाते पर अब वह भीख भी उठायी नही जाती । अब तो मन उसके बाबा का बानो में था दिन दिन भर कभी सड़क पर तो कभी पुलिस थाने में बीत जाता कभी कोई पुलिसवाला कुछ खिला देता तो बानो को देखने की चाहत में थोड़ा सा उसके बाबा खा लेते। एक हफ़्ता यूँ ही बीत गया और अगले दिन उसके बाबा के पास ख़बर आयी कि बानो मिल गयी मानो उसके बाबा को आंखें मिल गयी दौड़ता भागता कभी गिरता कभी संभलता वो पुलिस थाने जा पहुँचा। जहाँ उसके कान अपनी बेटी की आवाज़ सुनने को मचल रहे थे उसका माथा चूमने को कर रहा था वहाँ उसको छूने मिला तो उसका पार्थिव शरीर , जिसको एक हफ्ते से कुछ मनचले लड़को ने मिलकर उजाड़ दिया।
ज्यों ही उसके पिता ने उसके शरीर को छुआ मानो उनकी खुद की जिन्दगी खत्म हो गयी उन्हें जब पुलिस इंस्पेक्टर ने बताया कि बानो जब पानी लेने गयी तब कुछ लड़को ने उसका अपहरण कर लिया और एक हफ्ते तक उसके साथ ज़ुल्म किये, ये सब वह ज्यादा न सह पायी और कल जब हमें बानो मिली तो तब तक वह मर चुकी थी । जो कान उसकी आवाज़ सुनना चाहते थे , वो उसकी मौत का समाचार सुन रहे थे न जाने कितने सवाल थे उस मन मे जिसकी आंखों का तारा , उस अंधे की लाठी को छीन लिया था । हज़ारो सवालों में बस एक सवाल ही उस बूढ़े ने पूछा, "क्या आपने उन लड़कों को पकड़ लिया है?" तो मैं उन्हें बस छू कर पहचाना चाहता हूँ ।जिन्हें उस मासूम की चीखों से उस पर दया नही आई । क्या कुसूर था मेरी बेटी का जो उसे ऐसी मौत मिली। उसकी बातों का शायद कोई जबाब किसी कर पास शायद था ही नही।
इतना कहकर वह पुलिस थाने से अपने अकेले घर मे चला गया ।
अगले दिन जब थानेदार साहब ने उसे उसकी बेटी का पार्थिव शरीर अंतिम क्रिया केे लिए ले जाने के लिए हवलदार को भेजा । वहाँ पता चला कि अंधे बाबा भी रात को चल बसे बस ले गए तो मन मे हज़ारो सवाल जो ।
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