अपरिमित,अपार
अकेला पड़ा है।
खुदपर से गुजरे,
हर किस्से का,
मूकदर्शक बना है।
अपरिमित अपार
अकेला पड़ा है।
किसी के दुख का,
किसी के सुख का,
किसी की जीत का,
किसी की हार का,
ये गवाह हुया है।
अपरिमित अपार
अकेला पड़ा है ।
हर कष्ट सहकर भी,
डटकर खड़ा है।
गुजरे हुए हर शख्स की,
यादों में ये बसा है।
अपरिमित अपार
अकेला पड़ा है।
जाने अनजाने कितने,
अनुभवों को इसने छुआ है।
अपिरिमित अपार
अकेला पड़ा है।
कितने ही राहगीरों से
ये घिरा है,
किसी की मंजिल का,
किसी की उम्मीदों का,
किसी के सपनों का,
हिस्सा हुया है।
अपरिमित अपार....
स्थिर होकर भी,
हर पल चलता रहा है,
कही उजाड़ होकर,
अत्यंत भयानक लगा है,
तो कही
छांव दार पेड़ो से
ढका हुआ ये
अति मनोरम प्रतीत हुआ है।
अच्छा है,
या बुरा है,
खुद के चयन पर
ये निर्भर रहा है।
अपरिमित अपार
अकेला पड़ा है।
अपरिमित,अपार
अकेला पड़ा है।
कितनी ही रचनाओं का
आधार ,
कभी न कभी ये भी हुआ है।
रास्ता है ये,
जो अपरिमित अपार
अकेला पड़ा है।।
ये कविता रास्ते के उस रूप को अभिव्यक्त करती है जिसमे वह किसी की ख्वाहिश बनकर किसी के आँसू बनकर किसी की तलाश बनकर तो किसी की मंजिल बनकर खुद को व्यक्त किया है।
~प्रियंका"श्री"
24/11/17
आपकी पैनी नजर से रास्ता भी न बच सका
ReplyDeleteखुदपर से गुजरे,
हर किस्से का,
मूकदर्शक बना है।
अपरिमित अपार
अकेला पड़ा है।
।।।।।।।बहुत सुंदर रचना.....
बहुत ही अच्छा लिखा है
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद श्रीवास्तव जी
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद पुरुषोत्तम जी
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