Thursday, November 16, 2017

जब अपना कोई याद आया


यूँ ही बैठे बैठे
जब अपना कोई याद आया।

नयनों के अश्रु से
होठो की हंसी बनकर।

यादों की माला बन
स्मृति पटल पर न
जाने कितने चिन्हों
को चिन्हित कर।

कुछ कही-अनकही बातों
को दोहराकर।
मन मेरा,
गुज़रे लम्हों को
फिर से जीने की चाह
बनाकर।

ज़िक्र तेरा फिर से
लबों पर लाकर
तन्हाइयों में
तुझे पास न पाकर।

ठहर जाता।

खामोशियों में तेरी आवाज़
गूंज जाती
उन हवाओं के साथ।

जो छू जाती तन को मेरे
इस एहसास के साथ।

नहीं हो तुम यहाँ,
अस्तित्व विहीन हो।

फिर भी हो पास मेरे
मुझको यकीन है।

सोचती हूँ जब
बारे में तुम्हारे।

तुमको खुद में
अभिपूर्ण पाती हूँ।

मन उस वक़्त भावुक
हो जाता।

दिल की गहराइयों में
जब खुद को एकांत पाती हूँ।।

                     ~प्रियंका"श्री"
                        16/11/17

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