ढला हुया चेहरा
बुझी हुई आँखे
फटे हुए होठ
बिखरे हुए बाल।
फटे हुए कपड़े
जो ढंग से तन भी
नही छुपा पाते।
हाथ फैलाये
हर सिग्नल,हर बाजार
में हमसे ये टकराते।
कभी ठुकराते
तो कभी मुँह फेर जाते।
दया गर आती
दो पैसे हम दे जाते।
यह मजबूरी है उनकी
या धंधा है ,
जीवन यापन का ।
बात कठिन है
समझ इसको पाना।
कभी करुणा कभी रौद्र
इन रसों से परिपूर्ण।
मन के भाव
जिन्हें इनको हम दिखलाते।
हर एक के पास जाकर
अपनी भूख मिटाने की बात
जो ये कह जाते।
इस परिचय को पूर्ण
करते ये ।
भिखारी है कहलाते।।
15/11/17
~प्रियंका"श्री"
बहुत अच्छी} कविता} है
ReplyDeleteधन्यवाद
ReplyDeleteधन्यवाद
ReplyDeleteसुन्दर!!!
ReplyDeleteधन्यवाद विश्वा जी
ReplyDeleteभिखारी का मार्मिक वर्णन ।।।।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद पुष्पेंद्र जी।
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