Tuesday, November 14, 2017

भिखारी

ढला हुया चेहरा
बुझी हुई आँखे
फटे हुए होठ
बिखरे हुए बाल।

फटे हुए कपड़े
जो ढंग से तन भी
नही छुपा पाते।

हाथ फैलाये
हर सिग्नल,हर बाजार
में हमसे ये टकराते।

कभी ठुकराते
तो कभी मुँह फेर जाते।

दया गर आती
दो पैसे हम दे जाते।

यह मजबूरी है उनकी
या धंधा है ,
जीवन यापन का ।

बात कठिन है
समझ इसको पाना।

कभी करुणा कभी रौद्र
इन रसों से परिपूर्ण।

मन के भाव
जिन्हें इनको हम दिखलाते।

हर एक के पास जाकर
अपनी भूख मिटाने की बात
जो ये कह जाते।

इस परिचय को पूर्ण
करते ये ।

भिखारी है कहलाते।।
                15/11/17
               ~प्रियंका"श्री"

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