Monday, November 13, 2017

नारी


रूप में मनभावन,
आकर्षण की देवी,
भले सुकोमल मन
तुम्हारा।

तन से भी कमजोर नहीं,
मन से सुदृढ़ सदा ,
अपार सहन शक्ति
हैं तुझमें।

स्वाभिमान न कभी
अभिमान बना।

सृजन का है वरदान तुम्हें
सपनों का अपने,
करती है बलिदान की सदैव।

तू ही अन्नपूर्णा, तू ही लक्ष्मी
तू ही दुर्गा, तू ही सरस्वती
तू ही जीवन आधार
है कहलाती।

हर रस से परिपूर्ण है तू,
अलंकार से युक्त है तू,
नमन सदा है तुमको मेरा,
तुम नारी सम्मानीय सदा।।
                       ~प्रियंका"श्री"
                          16/11/17

No comments:

Post a Comment

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...