Wednesday, November 8, 2017

रिश्तों की कमी

पहले के रिश्ते भी
क्या खूब हुआ करते थे
कहने को नहीं
रहनें को सब
साथ हुआ करते थे।

बेगानापन भले जुबां
में दिखता हो
दिलों में तो प्यार बसा करते थे।

दर्द का अहसास खुद से पहले
अपनों को हुआ करता था
आखिर
होठों की हंसी ,आँखों की नमी
से अपनों के दिल जुड़ा करते थे।

नीव का पत्थर परमार्थ,
आदर, समझौता,अपनो का
खयाल हुया करता था
आज के रिश्ते तो स्वार्थ
पर टिके होते है।

आज भी याद आता है वो वक्त
जब बड़ो के वो किस्से कहानी
जिससे दिन रात खिला करते थे।

त्योहारों पर घर मोहल्ला
सा हो जाता था
खुशियों में जब सब एक जगह
हुआ करते थे
हर दिन रौनक से भरा होता था
रातों को अपनो के ख्वाब
हुया करते थे।

जी करता है काश !
आज फिर वो पल मिल जाये
जो अपनों को अपनों
से जोड़ जाये।

हर शिकवे गीले भुला कर
सबको एक तार में बांध दू
डोर चुनूँ भी ऐसी जिसमे
टूटने की कशिश न रह जाये
बांध चले जो सबको एक सा
मन में किसी के भी
एक भेद न बस पाए।।
                        ~प्रियंका"श्री"
                          8/11/17

7 comments:

  1. बहुत सुंदर लिखा है।

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  2. सही कहा आपने । क्क्त की घुन लग गई है शायद रिश्तों में, बेस्वाद हो चुका है मीठापन
    लिखते रहें.... बधाई।

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  3. बहुत बहुत आभार आपका पुरुषोत्तम जी।

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  4. बहुत बहुत आभार लोकेश जी।

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  5. bahut sunder rachna
    sacchai darshati....hakikat

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  6. Bahut bahut dhanyvad neetu ji .Bas ek chhoti si koshish

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