Thursday, December 21, 2017

मन

क्षिप्र मन करे विचरण
लेकर अनगिनत भावो को संग।

कभी शांत चित्त,
कभी अशांत मन।

जहां जैसा दृश्य देखे नयन,
वैसा भाव राखे मन,
भावों के सागर में डूबा,
विह्लल मन,गलियों गलियों फिरे।

क्या करूँ कहाँ जाओ,
यही प्रश्न धर कर,
अवसन्न चित्त से,
बारम्बार विचार करें।

भावो के सागर में,
भावमग्न होकर ,
जब मन ,न कर पाए
वश में भावों रूपी लहर,
अतृप्त मन भटकाव करे।

सोच विचार कर ,
शांत मन को करने के,
कैसे कैसे अथक प्रयास करे।

तृप्ति पाने को मन ,
न जाने क्या क्या प्रपंच रचे।

कई बार सफल ,
कई बार विफल हो कर,
समझ असमझ के खेल में,
मन से हारा सब जग ,
तब धर हावी मन,
दर्शाये मार्ग पर चले।

चंचल मन चन्द्र सम
प्रकाशमय कर पूरा तन
न जाने कितने रंगों से रंगे।
                        ~प्रियंका"श्री"
                           21/12/17
                          

4 comments:

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...