सफेद साड़ी में जड़ी
मासूमियत चेहरे पर धरी
डरी-डरी सहमी सी
दृष्टि बचाकर चली
साज श्रृंगार से दूर
कांतिविहीन मुखमंडल धरे
रंग बिरंगे परिधानों को
परित्याग किये हुए
चेहरे पर भयावह धरे हुये
अकेली-अकेली रही
साज श्रृंगार
की उम्र में
हाथों की चूड़ियां गई
पांव की पायल गई
माथे की लाल बिंदिया गई
लाल ओढ़नी की चमक गई
हर सुख से वंचित
हर चाह से विमुख
बंदिशों में जकङी
आँखों में सदा लिए आँसू
दुखियारी रह गई
घृणा का पात्र बनी
अपशब्दों से बुनी
शगुनों में जो पहले गिनी
अपशगुनी कहि गई
चरित्रवान रही
फिर भी चरित्रहीन समझी गई
अंधकार मय जीवन में
न जाने क्यों
धकेली गई
परंपराओ में घिरी
इंसानियत ढूँढ़ती फिरी
दुखों से परिपूर्ण
अधीनस्थ वो
ठगी-ठगी सी
बेबस हो चली
न कोई अपना
न पराया
हर इच्छा की
बलि दे चली
अपनों की सेवा
मन मे बसाये ,
सब सहते हुए
जी चली
किस्मत थी उसकी
विधवा होना
पर कर्म जिसमे
खुशियां थी
अब भक्ति भरने लगी
न खुशियों की लालसा
न उच्च जीवन की
अभिलाषा
दुख में भी सुख
की तलाश कर
ईश्वर का यही
निर्णय मानकर
काटों रूपी राह पर
चल पड़ी
नाम होते हुए भी
विधवा नाम से जानी गई
श्रापित न होकर भी
अभिशप्त हो गई।।
~प्रियंका"श्री"
4/12/17
सफेद साड़ी में जड़ी
ReplyDeleteमासूमियत चेहरे पर धरी
डरी-डरी सहमी सी
दृष्टि बचाकर चली
Very Hart touching.....
धन्यवाद नीतू जी।
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