रात के 8:30 बज चुके थे पारुल भी जल्दी जल्दी खाना बनाकर,अभी आराम से सोफे पर बैठी ही थी,कि रवि ने पारुल को आवाज़ लगाते हुए कहा -
"पारुल खाना लगा दो, बहुत भूक लग रही है ।"
पारुल ने भी सुनकर कहा-"जी अभी लगती हूँ।"
कहते हुए सोफे से उठी और अपनी बेटी यशी को खाना खाने के लिए पुकारने लगी ।
"यशी बेटा चलो आओ खाना खालो।"
रवि और यशी दोनों अपने अपने कमरे से बाहर आये ।और रवि सोफे पर बैठते हुए टेलीविजन को चालू करते हुए यशी को अपने पास बेठने को कहने लगा।
तब तक पारुल ने टेबल पर खाने की थाली लगा दी।
चूँकि यशी जो कि अभी सिर्फ 5 साल की थी उसे स्वयं अपने हाथों से थाली में लगा खाना खिलाने वही बैठ गयी।
उस समय टेलिविजन पर एक विज्ञापन आ रहा था -
"जिसमे एक बच्चा जो कि करीब 10 साल का लड़का था अपने दोस्तों की छेड़छाड़ से परेशान होकर अपनी साइकिल वही घर के बाहर दोस्तों के पास छोड़ कर ,घर के अंदर भाग कर आता है उसके अंदर आते ही उसके माता पिता जो यह सब देख रहे थे उसके पिता उससे बोल पड़ते है
पिता- बेटा बाहर जाओ और वो साइकिल तुम्हारी है ना उसे लेकर वापस आओ।
पिता के ऐसे कहते ही बच्चा बिना कुछ बोले अपने कमरे में चला जाता है।
यह सब देख रही उसकी माँ उसके पिता से कहने लगती है
मां(बच्चे के पिता से)-आपने देखा न !वो बच्चे उसे कैसे परेशान कर रहे थे फिर भी आप उसे वहां वापस भेजना चाहते है ।
पिता (उसकी मां को यह उत्तर देते हुए)- हम दोनों यहां अपने बच्चे को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने की तैयारी कर रहे है और तुम उसे अभी से डर में जीना सीखना चाहती हो ।अगर वह अभी डर गया और गलत रोकने के लिये खड़ा नही हुया तो वह हमेशा ही इसी तरह अपनी परेशानियों से भागेगा ।
अपने पिता की बातें सुन रहा बच्चा घर से बाहर जाकर अपनी साइकिल लेकर वापस घर आता है उसके माता पिता उसे ऐसा करते देख सुख हो जाते है।"
यह विज्ञापन देखते ही तुरंत रवि बोल उठे- मां होती ही ऐसी है हमेशा बच्चों को डर कर ,दब कर जीना सिखाती है जो बच्चों को आगे बढ़ने से रोकता है ।
ये तो हम पिता है (चेहरे पर अहम का भाव लिए हुए)जो बच्चों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है। उनके अंदर के डर को दूर करते है।
रवि (पारुल की तरफ देखते हुए कहता है)-क्यों पारुल ठीक कहा न ?
हर स्त्री ऐसी ही होती है।
रवि की बात सुनकर रही पारुल ने उत्तर दिया-बिल्कुल ।
हम मां ,स्त्रियां ऐसी ही होती है पर इसमें गलती हमारी नही हमें दिए गए संस्कारों की है अगर हमें भी बचपन में ,इसी तरह हर मुसीबत का सामना करने का साहस दिया होता, जब भी कोई हम लड़कियो को गन्दी-गन्दी बातें कहता तो हमें उसको मुहँ तोड़ जबाब देने की अनुमति होती।न कि ,यह सुनना पड़ता कि "लड़की हो अब उस रास्ते से अब मत जाना "या "तुम्हरा घर से,अब निकला बन्द" या "लड़कियाँ ऐसे काम नही करती" इसी तरह के दिये जाने वाले न जाने कितने सुझाव।
गर ये सब न सिखाया होता।
तो हम,मां भी अपने बच्चों को व परिवार के किसी भी सदस्य के लिए इस तरह के डर के भाव न खुद रखते ,न रखने देते।
हम स्त्रियां हमेशा से ऐसी नही थी ।पुराने समय में हम ही,अपने बच्चों चाहे ,लड़की हो या लड़का। उसे समान शिक्षा से निपुण करते थे।
पारुल की यह बात सुनकर रवि थोड़ी देर मौन हो गया व उसकी बात से सहमत होकर कह उठा -पर मैं अपनी बेटी को कभी भी डर से जीने की नही बल्कि पूरी तरह साहस से भरकर गलत का विरोध कर सिर उठाकर जीने की अनुमति दूँगा।
रवि की बात सुनकर पारुल का मन भी हल्का हो गया।
~प्रियंका"श्री"
18/1/18
बहुत सुंदर
ReplyDeleteBahut bahut abhar neetu ji
ReplyDeleteवाह!एक छोटे से लम्हे को कितनी अच्छी प्रेरणादायक कहानी में पिरोया है। इसे संस्मरण कहेंगे शायद कहानी नहीं।
ReplyDeleteThank u ansul.
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