Sunday, February 18, 2018

मैं एक राही हूँ इस जग का

मैं एक राही हूँ इस जग का
न  कोई ठौर,न कोई बसेरा।

जग जग घूमूँ , डग डग चूमूँ
फिरता फिरू,बन एक फकीरा।

मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर,न कोई बसेरा।

सखा हुया सूरज अब दखो
दिखलाये हर डग पे सबेरा।

फैली हुई उसकी किरणें
अंतर्मन में भरे उजेला।

मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर, न कोई बसेरा।

दिव्यप्रभा ज्वलित कर जाता
वो भोर का ,है प्रथम सितारा।

राही का पथ दर्शक बन जो
मार्ग उचित दर्शित करजाता।

निभाने अपनी विहित रीत जो
सदैव उदित पूरब से अम्बर पर आता।

मैं रक राही हूँ, इस जग का
न कोई ठौर , न कोई बसेरा।

चाँद की जब चंचल किरणों से
शीतल होता तन मन मेरा।
फैली हुई तारों की रजनी
पेहरी बन कर देती पेहरा।

मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर,न कोई बसेरा।

एकाकीपन से खाली मन जब
विरक्ति के भावों से भर जाता।

धरती का तब प्रत्येक कण
मां बन कर जो, प्रेम आशीष लुटाता।

फैला गगन तब आँचल बनकर
मुझको अपने चित्त लगाता।

मैं एक राही हूँ ,इस जग का
न कोई ठौर,न कोई बसेरा।

अपनत्व भाव से ऊपर उठता
अपना पराया सब विसराता।

हर जन को स्वीय मानकर
आपस मे प्रेम बंटन कर जाता।

सम्पूर्ण जग को निज मानकर
फिरता फिरू बनकर मैं,यूँ ही अकेला।

मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर , न कोई बसेरा

हर बन्धन से होकर मुक्त मैं
उड़ता फिरू खग सा स्वतन्त्र मै
अम्बर, धरा है मेरा डेरा।

मैं रक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर, न कोई एक बसेरा।
                        ~प्रियंका"श्री"
                           12/2/18











16 comments:

  1. दिव्यप्रभा ज्वलित कर जाता
    वो भोर का ,है प्रथम सितारा।

    राही का पथ दर्शक बन जो
    मार्ग उचित दर्शित करजाता।

    निभाने अपनी विहित रीत जो
    सदैव उदित पूरब से अम्बर पर आता।
    👌👌👌
    अत्यंत ही प्रभावशाली और सुन्दर रचना हेतु बधाई आदरणीय प्रियंका जी।

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    1. बहुत बहुत आभार सर्।बहुत वक़्त बाद आपका कमेंट पाया ।मन प्रसन्न हो गया।जब आप सब बड़ो का आशीर्वाद मिल जाता है।

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    2. बहुत बहुत आभार सर्।बहुत वक़्त बाद आपका कमेंट पाया ।मन प्रसन्न हो गया।जब आप सब बड़ो का आशीर्वाद मिल जाता है।

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  2. आपकी इस रचना से मुझे अपनी ही इक रचना "रुकी सी प्रहर" याद आ गई...

    रुकी सी लहर, रुकी सी गर्जन इस सागर की.....

    कंपित प्राणों के सुर थे उस पल में,
    गतिशील कई आशाएँ थी इस जीवन की,
    झरणों सा संगीत था उस लहर में,
    रुकी है प्रहर, रुके हैं गुंजित स्वर उस कोयल की...

    रुकी सी स्वर, रुकी सी गायन इस जीवन की....

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  3. क्या बात है मैं आपके ब्लॉग पर जाकर जरूर पढूंगी सर्

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  4. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति
    मन को छूती हुई

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    1. बहुत बहुत आभार लोकेश जी

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  5. बहुत ही अद्भुत, खूबसूरत ...वाह ! वाह!

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  6. वाह ....बहुत बढ़िया

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  7. कौन किसका साथ निभाता जीव
    अकेला आता अकेला ही जाता
    हिम्मत का राही पथरीली
    राहो पर बढ़ता ही जाता

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