गलतफहमीयों की दीवारों को
इतना मजबूत मत करो।
इतना मजबूत मत करो।
जब ये गलतफहमीयां दूर होगीं,
तब सिर्फ ये दीवारें रह जायेंगी,
जिन्हें चाह कर भी,
फिर कोई दूर नहीं कर पायेगा।
तब सिर्फ ये दीवारें रह जायेंगी,
जिन्हें चाह कर भी,
फिर कोई दूर नहीं कर पायेगा।
ये रिश्तों के बीच कब बढ़ जायेगी,
आभास भी तुझे इसका नहीं लग पायेगा।
आभास भी तुझे इसका नहीं लग पायेगा।
तब ये ख़ुदा के बंदे तेरे पास
बस पछताने को ही रह जायेगा।
बस पछताने को ही रह जायेगा।
गर है थोड़ी सी भी खुदाई तुझमें,
तो अपनों को आज अपना बना ले।
तो अपनों को आज अपना बना ले।
गैर गर हो गए अपने तो ,
अपना बनाने का फिर तुझे,
वक़्त भी नहीं मिल पायेगा।
अपना बनाने का फिर तुझे,
वक़्त भी नहीं मिल पायेगा।
~प्रियंका"श्री"
22/3/18
22/3/18
बहुत सुन्दर....
ReplyDeleteआभार सुधा जी
Deleteवाहःह बेहतरीन
ReplyDeleteआभार लोकेश जी
Deleteवाह बहुत सुन्दर भाव प्रधान रचना सद्भावना जाग्रत करती अप्रतिम
ReplyDeleteआभार दी। दी पर आप सब इतन अच्छा लिखते है मुझे भी मार्गदर्शन दीजिये ।मुझे प्लस किताबों की जानकारी दे जिन्हें पढ़कर औरअच्छी कोशिश करू
Deleteबहुत उम्दा
ReplyDeleteआभार शकुंतला जी
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