जिंदगी आसान समझ ली थी उसनें शायद
तभी इतना बेपरवाह हो गया।
जिस दौड़ में भागा था वो, निकलने को आगे
जान भी न सका ,कब उस दौड़ से गायब हो गया।
प्रियंका"श्री"
4/4/18
तभी इतना बेपरवाह हो गया।
जिस दौड़ में भागा था वो, निकलने को आगे
जान भी न सका ,कब उस दौड़ से गायब हो गया।
प्रियंका"श्री"
4/4/18
बहुत ही सुंदर।
ReplyDeleteThank u
ReplyDeleteसचमुच अंधी दौड़ में इंसान अपना अस्तित्व ही मिटा डालता है | सार्थक पंक्तियाँ !!!!!!!
ReplyDeleteआभार रेनू जी
Deleteनमस्ते,
ReplyDeleteआपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
गुरूवार 5 अप्रैल 2018 को प्रकाशनार्थ 993 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।
प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
सधन्यवाद।
बहुत बहुत आभार रविन्द्र जी
Deleteसच है अंधानुकरण से कुछ भी हासिल नहीं होता है, फिर भी कुछ लोग जिंदगीभर नहीं समझ पाते इतनी सी बात
ReplyDeleteबहुत खूब!
बहुत खूब.....
ReplyDeleteसार्थक पंक्तियाँ !!
ReplyDeleteवाह बहुत ख़ूब
ReplyDeleteवाह बहुत ख़ूब
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