Sunday, April 1, 2018

विचार

मेरे खव्वों की दुनियाँ छोटी नहीं थी,
कर गुजरने का हौसला भी असीम था,
कमी बस यही रह गयी थी कि,
हाँथो में मेरी जिंदगी की
लकीर छोटी बस गयी थी।

फिर भी एक सुकून रहेगा मुझे
जो कुछ कर गुजर गए
क्या खूब कर गुजर गए
छोटी सी जिंदगी में ही अपना
नाम कर गए।
                    प्रियंका "श्री"
                    1/4/18

6 comments:

  1. दो दिन का काम कई बार एक दिन में कर जाता ही इंसान ... होंसला और हिम्मत करती है ये सब ...
    हाथों की लकीरें कई बात बढ़ जाती हैं ...
    बहुत ख़ूब ...

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  2. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 11अप्रैल 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    Replies
    1. बहुत बहुत आभार पम्मी जी

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