मेरे खव्वों की दुनियाँ छोटी नहीं थी,
कर गुजरने का हौसला भी असीम था,
कमी बस यही रह गयी थी कि,
हाँथो में मेरी जिंदगी की
लकीर छोटी बस गयी थी।
फिर भी एक सुकून रहेगा मुझे
जो कुछ कर गुजर गए
क्या खूब कर गुजर गए
छोटी सी जिंदगी में ही अपना
नाम कर गए।
प्रियंका "श्री"
1/4/18
दो दिन का काम कई बार एक दिन में कर जाता ही इंसान ... होंसला और हिम्मत करती है ये सब ...
ReplyDeleteहाथों की लकीरें कई बात बढ़ जाती हैं ...
बहुत ख़ूब ...
सही कहा आदरणीय।आभार
Deleteआपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 11अप्रैल 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार पम्मी जी
Deleteबहुत ख़ूब
ReplyDeleteआभार रितु जी
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