वो ईट पत्थरों से बने हुए मकान
वो बनकर बेजान पड़े हुए है मकान
दिखने में जो आलीशान है मगर
रूह से जुदा हुए वो मकान
कितने मायूस दिखते है वो
अंदर से जो तबाह हुए मकान
ज़मीन से जुड़े हुए है जो मगर
फिर भी वीरान पड़े हुए मकान
उनसे अच्छे तो परिंदों के वो घर होते है
जो कच्चे होते है मगर प्यार में बसे होते है
~प्रियंका"श्री"
2/5/18
Tuesday, May 1, 2018
मकान
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कविता
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वाह बहुत सुन्दर बात कही आपने काव्य के माध्यम से
ReplyDeleteसुंदर रचना।
वाह!बहुत खूब!
ReplyDeletesundar rachna... kaash ye makaan ghar ban jaayen
ReplyDeleteबहुत खूब....
ReplyDeleteबहुत ही उम्दा👌
ReplyDeleteबहुत खूब
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