Thursday, May 23, 2019

अपेक्षाएं

धरती पर जन्म लेते ही जैसे मानव में बुद्धि और समझ का विकास होता है उसमें अपेक्षायों की बृद्धि होने लगती है ।और यही से शुरू हो जाता है मानव जीवन मे दुखी होने का रास्ता।
जब तक मानव एक अबोध बालक होता है उसके अंदर उम्मीदें न के बराबर होती है लेकिन जैसे जैसे बढ़ता है चेहरे पहचानने लगता है स्पर्श समझने लगता है उसकी जरूरतों का प्रारम्भ हो जाता है ।
और धीरे धीरे वो तेज़ दलदल में पड़ता जाता है जहां से निकलना उसके सामर्थ में नही होता। जब तक वह ये न जान ले कि ऐसा होने कारण क्या है?
क्यों जो बचपन मे सिर्फ कुछ कारणों से दुखी था उसके विकास के साथ उसके दुख भी बढ़ते गए।
दुखों के कारण कई होते है पर बहुत से कारणों का जन्म दाता है अपेक्षाएं ,उम्मीदें, जरूरते, उन पर निर्भरताएँ।
इसे समझना आसान नही ,पर नामुमकिन तो बिल्कुल नही ।
बस इतना जानना है कि जब हमारा जन्म इस धरती पर अकेले हुआ है और हमारी मुत्यु भी अकेले ही होनी है और हर व्यक्ति को ईश्वर द्वारा अपना शरीर प्राप्त है तो क्यों हम किसी से भी अपेक्षाएं करे।
हमारा संकल्प जीवन को मन के भीतर से सुखमय बनना होना चाहिए । न कि ईश्वर के दिये वरदान को दूसरों पर अपेक्षाएं रखकर दुखी करना । जो अपेक्षाएं हम दूसरों से करते है पहले स्वयं से करें। क्या वो हम पूरी कर सकते है?
अगर हां,  तो पहले स्वयं प्रयत्न करें, तभी इस मूल्यवान जीवन मे खुशी का सार समझ आएगा।
प्रियंका श्री
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