पंजाब के अमृतसर में स्थित जलियांवाला बाग़ की कहानी भारतीय इतिहास में एक खूनी कहानी है जो हर भारतीय की रूह को कांप देती है।
ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों पर जब रॉलेट एक्ट लागू किया गया तब से भारत के हर प्रान्त में इस एक्ट के विरोध में प्रदर्शन होने लगे । महात्मा गांधी ने भी इस एक्ट के विरोध में पूरे देश में हड़ताल करने की ग़ुज़ारिश की। ऐसे में पंजाब प्रांत जो ब्रिटिश सरकार का गढ़ था वहां भी 6 अप्रैल को हड़ताल की गई और यह हड़ताल सफल भी रही। उसी वक़्त आये राम नवमी के पर्व को हिन्दू और मुसलमानों ने साथ मिलकर बहुत धूमधाम से मनाया । इन आंदोलनों से ब्रिटिश सरकार पहले से ही बहुत परेशान थी ऐसे में पंजाब में 6 अप्रैल को हुई हड़ताल अपने ही मजबूत गढ़ में सफल होने पर उनका क्रोध और बड़ गया। अतः ब्रिटिश सरकार ने पंजाब के जनरल आर डायर को इन आंदोलनों को रोकने की हिदायत दी। जनरल डायर, जो पंजाब में हो रहे इन आंदोलनों और हिन्दू मुस्लिम एकता से परेशान था। उसको मौका मिल गया । और डायर ने इस हड़ताल के जबाब में तुरंत पंजाब के दो बड़े नेताओं एक डॉक्टर सत्यपाल और दूसरे सैफ़ुद्दीन मलिक को गिरफ़्तार कर निर्वासित कर दिया गया ,जो 13 अप्रैल को एक शांतिपूर्ण सभा को संबोधित करने वाले थे ।
इन दोनों नेताओं के साथ हुए इस व्यवहार से पंजाब के लोगों का गुस्सा भड़क गया परंतु फिर भी सब ने जलियांवाला बाग़ में शांतिपूर्ण सभा को करने का निश्चय किया। जब ये बात जनरल डायर को पता चली तो वह शाम होते ही अपने हज़ारों सैनिकों और हथियारों के साथ बाग़ पहुँच गया। और बाग़ को चारों तरफ से घेर लिया गया। बाग़ से निकलने वाले रास्तों पर सैनिक मौजूद थे और डायर के कहने पर सैनिकों ने बाग़ में मौजूद लोगों पर जिनमें बच्चें,बुज़ुर्ग, महिलायें व पुरुष सभी शामिल थे । उन पर गोलियों की बारिश कर दी गयी। गोलियों की आवाज़ से खुद को बचाने के लिए लोग यहां वहां भागने लगे । कई लोगों ने तो गोलियों से बचने के लिए बाग़ में उपस्थित कुएं में छलांग लगा दी। यह एक ऐसा मंजर था जहां सिर्फ लोग भाग रहे थे। पैरों के नीचे दब कर ,गोलियों से और कुएं में कूंद कर मर रहे थे। सरकार द्वारा दिये गए आंकड़ों में तो मरे हुए लोगों की संख्या सैकड़ों बताई गई थी पर वास्तविक संख्या हज़ारों में ही होगी।
यह इतिहास की ऐसी घटना है जिसने मानवता को शर्मशार किया। 2019 में इस घटना के पूरे 100 वर्ष होने पर ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा ने इसे" ब्रिटिश भारतीय इतिहास को शर्मशार करने वाला धब्बा" कहा था। परन्तु इस घटना के लिए माफी नही मांगी गई थी।
आज के ही दिन हमने स्वंतत्रता के लिए लड़ने वाले अपने इन हज़ारों लोगों को खोया था।
ये तारीख निहत्थों पर हुई क्रुरता को दर्शाती है जो हमेशा हमें इतिहास के पन्नों के द्वारा याद रहेगी।
प्रियंका श्री
13।4।20
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